Jagannath Rath Yatra: पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा की पहचान केवल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के विशाल रथों से नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी सदियों पुरानी परंपराओं से भी है। इनमें सबसे खास रस्म है 'छेरा पहरा' (chhera pahara), जिसे देखने के लिए लाखों श्रद्धालु हर साल इंतजार करते हैं। इस रस्म में ओडिशा के गजपति महाराज स्वयं भगवान के रथों पर सोने की झाड़ू लगाते हैं। पहली नजर में यह दृश्य किसी को भी हैरान कर सकता है कि एक राजा झाड़ू क्यों लगा रहा है। लेकिन जब इसके पीछे छिपे इतिहास, परंपरा और आध्यात्मिक संदेश को समझते हैं, तब पता चलता है कि यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि सेवा, विनम्रता और समानता का जीवंत प्रतीक है। आइए जानते हैं कि छेरा पहरा क्या है, इसमें क्या-क्या होता है और इसका महत्व इतना बड़ा क्यों माना जाता है।
छेरा पहरा क्या है और यह रस्म कब होती है
'छेरा पहरा' ओड़िया भाषा का शब्द है। 'छेरा' का अर्थ झाड़ू लगाना और 'पहरा' का मतलब सेवा करना माना जाता है। यह रस्म तब निभाई जाती है, जब भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने रथों पर विराजमान हो जाते हैं और रथ यात्रा शुरू होने वाली होती है।
इस समय ओडिशा के गजपति महाराज पारंपरिक शाही वेशभूषा में पालकी से रथों तक पहुंचते हैं। वर्तमान में यह सेवा गजपति महाराज दिव्यसिंह देव निभाते हैं। जगन्नाथ परंपरा में उन्हें राजा से पहले भगवान का प्रथम सेवक माना जाता है। यही वजह है कि उन्हें छेरा पहरा करने का विशेष अधिकार प्राप्त है।
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छेरा पहरा की पूरी प्रक्रिया कैसे होती है
यह रस्म केवल झाड़ू लगाने तक सीमित नहीं होती। इसकी पूरी प्रक्रिया धार्मिक परंपराओं के अनुसार संपन्न होती है। यह परंपराओं के अनुसार कई चरणों में पूरी की जाती है।
- प्रथम चरण: गजपति महाराज पारंपरिक शाही वेशभूषा में पालकी से रथों के पास पहुंचते हैं। वर्तमान में यह सेवा गजपति महाराज दिव्यसिंह देव निभाते हैं।
- द्वितीय चरण: इसके बाद वे 'कनक मार्जनी' यानी सोने की झाड़ू से भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के तीनों रथों - नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन के फर्श को प्रतीकात्मक रूप से साफ करते हैं। यह सामान्य सफाई नहीं, बल्कि भगवान के प्रति सेवा और समर्पण का प्रतीकात्मक अनुष्ठान होता है।
- तृतीय चरण: झाड़ू लगाने के बाद रथों पर सुगंधित चंदन मिश्रित जल का छिड़काव किया जाता है। कई पारंपरिक विवरणों में कपूर और अन्य सुगंधित पदार्थों के प्रयोग का भी उल्लेख मिलता है, जिन्हें पवित्रता, मंगल और वातावरण की शुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
यह पूरी प्रक्रिया भगवान के प्रति सम्मान, सेवा और पवित्रता का प्रतीक मानी जाती है। खास बात यह है कि यह रस्म केवल भगवान जगन्नाथ के रथ पर नहीं, बल्कि नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन - तीनों रथों पर निभाई जाती है।
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सोने की झाड़ू यानी 'कनक मार्जनी' का महत्व क्या है
कई लोगों के मन में सवाल आता है कि झाड़ू सोने की ही क्यों होती है? दरअसल, इस सोने की झाड़ू को 'कनक मार्जनी' कहा जाता है। यह केवल शाही वैभव का प्रतीक नहीं है, बल्कि इसका संदेश इससे कहीं बड़ा है। जगन्नाथ परंपरा में भगवान को समस्त सृष्टि का स्वामी और सर्वोच्च राजा माना जाता है। ऐसे में सांसारिक राजा भी भगवान की सेवा सबसे सम्मानित वस्तु से करते हैं।
यही वजह है कि छेरा पहरा में इस्तेमाल होने वाली कनक मार्जनी यह संदेश देती है कि ईश्वर के सामने पद, प्रतिष्ठा और सत्ता का कोई महत्व नहीं, बल्कि सबसे बड़ा सम्मान सेवा का होता है।
गजपति महाराज ही क्यों करते हैं यह सेवा
पुरी की परंपरा के अनुसार गजपति महाराज को भगवान जगन्नाथ का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि उनका 'आद्य सेवक' (First Servitor) माना जाता है। इसलिए रथ यात्रा के दौरान उन्हें स्वयं यह सेवा करनी होती है।
यह परंपरा समाज को भी एक बड़ा संदेश देती है कि नेतृत्व का अर्थ केवल शासन करना नहीं, बल्कि सबसे पहले सेवा करना है। यही कारण है कि राजा स्वयं झाड़ू उठाकर यह दिखाते हैं कि भगवान के सामने हर व्यक्ति समान है।
मंदिर के पारंपरिक इतिहास 'मदला पांजी' और जगन्नाथ संप्रदाय की परंपराओं में भी सेवा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इसी वजह से छेरा पहरा को रथ यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण सेवाओं में गिना जाता है।
राजा पुरुषोत्तम देव और कांची अभियान की प्रसिद्ध लोककथा
छेरा पहरा से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा भी सुनाई जाती है, जिसे कांची-कावेरी कथा के नाम से जाना जाता है। लोक परंपराओं के अनुसार, 15वीं शताब्दी में गजपति राजा पुरुषोत्तम देव ने कांची की राजकुमारी पद्मावती से विवाह का प्रस्ताव भेजा था। लेकिन कांची के राजा ने यह कहकर प्रस्ताव ठुकरा दिया कि जो राजा रथ यात्रा में झाड़ू लगाता हो, उससे वह अपनी बेटी का विवाह नहीं करेंगे।
इस अपमान के बाद पुरुषोत्तम देव ने कांची पर अभियान चलाया। लोककथा के अनुसार भगवान जगन्नाथ और बलभद्र ने भी उनकी सहायता की और अंततः विजय के बाद उनका विवाह राजकुमारी पद्मावती से हुआ। हालांकि इतिहासकार इसे एक लोकप्रिय लोककथा मानते हैं, लेकिन ओडिशा की सांस्कृतिक परंपरा में यह कथा आज भी श्रद्धा के साथ सुनाई जाती है। यह कहानी बताती है कि भगवान की सेवा करना कभी अपमान नहीं, बल्कि सबसे बड़ा सम्मान माना गया है।
क्या छेरा पहरा केवल एक दिन ही होता है
बहुत कम लोग जानते हैं कि छेरा पहरा केवल गुंडिचा यात्रा के दौरान ही नहीं होता। परंपरा के अनुसार, बहुदा यात्रा यानी जब भगवान अपने मुख्य मंदिर लौटते हैं, तब भी गजपति महाराज इसी तरह यह सेवा निभाते हैं।
यही वजह है कि रथ यात्रा के दोनों प्रमुख अवसरों पर यह रस्म उतनी ही श्रद्धा और भव्यता के साथ निभाई जाती है।
छेरा पहरा आज भी क्यों है इतनी खास परंपरा
आज के समय में, जब पद और प्रतिष्ठा को अक्सर सबसे बड़ा माना जाता है, तब छेरा पहरा एक अलग संदेश देती है। यह रस्म बताती है कि सच्चा नेतृत्व सेवा से शुरू होता है और ईश्वर के सामने हर व्यक्ति समान है। शायद यही कारण है कि सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है।
छेरा पहरा केवल रथ पर झाड़ू लगाने की रस्म नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के उस विचार का प्रतीक है, जिसमें विनम्रता, सेवा और समर्पण को सबसे बड़ा धर्म माना गया है। इसी वजह से जगन्नाथ रथ यात्रा की यह परंपरा आज भी दुनिया भर के श्रद्धालुओं को उतनी ही गहराई से आकर्षित करती है।
स्रोत:
इस लेख में दी गई जानकारी श्रीजगन्नाथ मंदिर, पुरी की पारंपरिक परंपराओं, मदला पांजी (Madala Panji) में वर्णित ऐतिहासिक विवरणों, ओडिशा की प्रचलित कांची-कावेरी लोककथा तथा जगन्नाथ संप्रदाय से जुड़े विश्वसनीय शोध एवं प्रकाशनों पर आधारित है।
