Karwa Chauth par Karwa Kyu Phera Jata hai: आज 29 अक्टूबर को करवाचौथ का पर्व मनाया जा रहा है। करवा चौथ की पूजा में करवा फेरने की रस्म का खास महत्व है। इस दौरान सुहागिन महिलाएं गोल घेरा बनाकर बैठती हैं और एक-दूसरे को करवा या पूजा की थाली सात बार देती हैं। इस रस्म के दौरान महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और पति की लंबी उम्र व सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं, लेकिन करवा आखिर सात बार ही क्यों फेरा जाता है? इसे फेरते समय महिलाएं क्या बोलती हैं और इस रस्म को निभाने का सही तरीका क्या है? आइए जानते हैं।
करवा चौथ पर करवा फेरने की रस्म क्यों निभाई जाती है
करवा चौथ की पूजा में करवा फेरने का मुख्य उद्देश्य सुहागिन महिलाओं के बीच शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करना और वैवाहिक जीवन की खुशहाली की कामना करना है। इस रस्म में महिलाएं अपने करवे या पूजा की थाली को एक-दूसरे के हाथों में देती हैं। इस तरह पूजा में शामिल सभी महिलाएं एक-दूसरे के साथ इस परंपरा का हिस्सा बनती हैं।
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा के कई इलाकों में यह रस्म अलग-अलग तरीकों से निभाई जाती है। कहीं मिट्टी के करवे बदले जाते हैं, तो कहीं पूजा की थाली एक महिला से दूसरी महिला तक पहुंचाई जाती है। इस दौरान करवा चौथ के पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और व्रत कथा भी सुनी जाती है।
करवा फेरने की रस्म में एक महिला दूसरी महिला को करवा देकर उसके सुहाग और वैवाहिक जीवन की खुशहाली के लिए शुभकामना देती है। यही वजह है कि इस रस्म में सिर्फ करवा घुमाने के बजाय उसे दूसरी महिला को सौंपने और वापस लेने की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होती है।
करवा चौथ पर सात बार ही क्यों फेरा जाता है करवा
करवा चौथ पर सात बार करवा फेरने का संबंध हिंदू विवाह के सात फेरों और सात वचनों से है। विवाह के समय पति-पत्नी सात फेरे लेकर एक-दूसरे के साथ जीवन बिताने और जिम्मेदारियां निभाने का संकल्प लेते हैं। करवा चौथ की रस्म में सात बार करवा फेरना इसी वैवाहिक बंधन को और मजबूत बनाता है। इस परंपरा में सात की संख्या का इस्तेमाल वैवाहिक जीवन की पूर्णता, आपसी विश्वास और साथ निभाने के भाव को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। हर बार करवा आगे बढ़ाने के साथ महिलाएं सुहाग और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं। इसका आधार धार्मिक प्रतीक और विवाह की परंपरा है। सात बार करवा फेरना किसी अलग ज्योतिषीय गणना का परिणाम नहीं, बल्कि सात फेरों से जुड़ी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। इसी कारण करवा चौथ की पूजा में सात बार करवा बदलने या थाली फेरने का चलन बना हुआ है।
करवा फेरते समय क्या बोला जाता है
करवा फेरने के दौरान महिलाएं पारंपरिक बोल बोलती हैं। इसमें ‘ले सुहागन ले करवा, दे सुहागन दे करवा।’ इसका अर्थ है कि एक सुहागिन दूसरी सुहागिन को करवा दे रही है और उससे करवा ले रही है। इस तरह करवा बदलने के साथ एक-दूसरे के सुहाग और सुखी वैवाहिक जीवन की मंगलकामना की जाती है।
कुछ परिवारों में माता के सामने करवा फेरते समय ये शब्द भी बोले जाते हैं कि ‘पार्वती माता सुहाग दे, चौथ माता सुहाग दे।’ इन शब्दों के जरिए महिलाएं माता पार्वती और करवा चौथ माता से अपने पति की लंबी उम्र, अखंड सौभाग्य और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इन बोलों के शब्द और गीतों की शैली थोड़ी अलग हो सकती है।
करवा फेरने की रस्म कैसे निभाई जाती है
करवा चौथ की शाम पूजा के दौरान महिलाएं एक साथ बैठकर इस रस्म को निभाती हैं। इसे पूरा करने का सामान्य तरीका इस प्रकार है।
सबसे पहले पूजा की तैयारी करें और करवा चौथ माता, माता पार्वती तथा भगवान गणेश की पूजा करें। इसके बाद व्रत कथा सुनते समय या पारंपरिक गीत गाते हुए महिलाएं अपने करवे या पूजा की थाली को एक-दूसरे को देना शुरू करती हैं।
करवा पहली महिला से दूसरी महिला तक पहुंचता है और इसी क्रम में सात बार फेरने की रस्म पूरी की जाती है। इस दौरान महिलाएं ‘ले सुहागन ले करवा, दे सुहागन दे करवा’ बोलती हैं। सातवीं बार के बाद करवा या थाली वापस अपने स्थान पर रख दी जाती है। इसके बाद पूजा और कथा की बाकी प्रक्रिया परिवार की परंपरा के अनुसार पूरी की जाती है। कुछ जगहों पर महिलाएं करवे को आपस में बदलती हैं, जबकि दूसरी जगहों पर पूजा की थाली को सात बार आगे बढ़ाया जाता है। दोनों ही तरीकों में मुख्य बात सामूहिक पूजा और शुभकामनाओं का आदान-प्रदान है।
अगर करवा चौथ की पूजा अकेले कर रही हैं, तो कैसे फेरें करवा
अगर कोई महिला घर पर अकेले करवा चौथ की पूजा कर रही है, तो वह अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार दो करवे रखकर उन्हें आपस में बदल सकती है। इसके बाद करवा चौथ माता के सामने पारंपरिक बोल बोलकर व्रत कथा सुन सकती है। अगर परिवार में करवा फेरने की जगह थाली फेरने का चलन है, तो उसी तरीके से पूजा की जा सकती है। अकेले पूजा करने पर भी सात बार फेरने की प्रतीकात्मक रस्म पूरी की जा सकती है। हालांकि, करवा चौथ की सभी रस्मों का तरीका हर परिवार में एक जैसा नहीं होता है।
करवा फेरने के बाद क्या किया जाता है
करवा फेरने की रस्म पूरी होने के बाद महिलाएं करवा चौथ की व्रत कथा सुनती हैं या कथा का पाठ करती हैं। इसके बाद माता की आरती की जाती है। पूजा के बाद महिलाएं चंद्रमा निकलने का इंतजार करती हैं। रात में चंद्रमा दिखाई देने पर उसे जल से अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद छलनी से चंद्रमा और फिर पति के दर्शन किए जाते हैं। पति के हाथ से पानी पीकर व्रत खोला जाता है। इस तरह करवा फेरने से शुरू हुई शाम की पूजा चंद्र दर्शन और व्रत पारण के साथ पूरी होती है।
