अध्यात्म

Importance of Chakras: शरीर के सात चक्रों से जुड़ी ये हैं खास जानकारी, यहां जानिए सभी चक्रों से जुड़ी अहम जानकारी

  • Authored by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Feb 1, 2023, 10:34 AM IST

Importance of Chakras: मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्त्रार चक्र होते हैं शरीर में मौजूद। शरीर में अदृश्य रहने वाले चक्रों का अपना विशेष महत्व होता है। इन पर अधिकार करने वाले अलौकिक शक्तियों से परिपूर्ण हो जाते हैं। आइये जानें सात चक्रों की विशेषताएं क्या हैं और आपक कैसे इनका लाभ उठा सकते हैं।

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जीवन में चक्रों का महत्व

KEY HIGHLIGHTS
  • शरीर में अदृश्य रूप से होते हैं सात चक्र
  • सातों चक्र होते हैं प्राणशक्ति की अभिव्यक्ति
  • चकाें पर अधिकार करने वाले योगी होते हैं

Importance of Chakras: भारतीय मनोवैज्ञानिकों सहित विभिन्न धार्मिक पुराणाें में मानव शरीर के विभिन्न चक्रों का वर्णन किया गया है। चक्र चेतना के सूक्ष्म केंद्र हैं। वे अदृश्य होते हैं। सात चक्र प्राणशक्ति की अभिव्यक्ति होते हैं। चक्र की बात जैसे आती है, तो हमसभी के मन में ये सवाल उठने लगते हैं कि ये चक्र शरीर में कहां-कहां होते हैं। तो आइये आपकाे आज बताते हैं शरीर में विभिन्न स्थानों में स्थिति सात चक्र की महिमा और उन से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातों को।

1. मूलाधार चक्र

यह सुषुम्ना नाड़ी में स्थित है। यह कुंडलिनी शक्ति का आधार है। इस स्थान पर ध्यान लगाने से कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होती है और विभिन्न प्रकार के आनंद की प्राप्ति होती है।

2. स्वाधिष्ठान चक्र

यह यौनेन्द्रियों के मूल में स्थित है। यह यौन अनुभूतियों और उनसे संबंधित प्रवृत्तियों का आधार है। इस पर ध्यान लगाने से काम, क्रोध, लोभ, मोह, अभिमान, द्वेष आदि दूर होते हैं और ज्ञान प्राप्त करने में सहायता प्राप्त होती है।

3. मणिपूर चक्र

यह नाभि के मूल में स्थित है। यह निद्रा, इच्छा, सांसारिकता, मोक्ष, भय, विश्वासघात, लज्जा, द्वेष, दुख आदि का आधार है। इस पर ध्यान लगाने से सृष्टि और विनाश की सृष्टि मिलती है।

4. अनाहत चक्र

यह सुषुम्ना के अंतर्गत हृदय के मूल में स्थित है। यह जीव का आवास है। इसी में अहंकार जनित संवेग, आशा, चिंता, संदेह, अभिमान आदि का निवास है। इस पर ध्यान लगाने से बुद्धिमत्ता, शुद्धता, इंद्रियों का नियंत्रण आदि की प्राप्ति हाेती है।

5. विशुद्ध चक्र

यह गले के मूल में स्थित है। इस पर ध्यान लगाने से दया, क्षमा, साहस, आत्मनियंत्रण, शुद्धता और समन्वय के गुण प्राप्त होते हैं और समस्त शास्त्रों का ज्ञान होता है।

6. आज्ञा चक्र

यह दोनों भौंहों के मध्य स्थित है। इस पर ध्यान लगाने से योगी सर्वज्ञ होता है। उसे सब शास्त्रों का ज्ञान होता है और वह ब्रह्म साक्षात्कार का अनुभव करता है। इसे योगी सब प्रकार के अज्ञान से छूटकर ओम में स्थित हो जाता है और परमानंद को प्राप्त करता है।

7. सहस्त्रार चक्र

इस पर ध्यान केंद्रित करने से योगी परम शिव से एक हो जाता है। उसके अज्ञान और मोह नष्ट हो जाते हैं। वह पाप और पुण्य से छूट जाता है।

विभिन्न धार्मिक ग्रंथाें में उपरोक्त चक्रों का उल्लेख मिलता है। ईश उपनिषद, योग चूड़ामणि आदि में चक्रों के बारे में लिखा है। हालाकि इनके नाम भिन्न हो सकते हैं। भाैतिक विश्व में जो प्राण शक्तियां काम कर रही हें वे चक्रों के माध्यम से मानव देह में भी हैं।

(डिस्क्लेमर : यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। टाइम्स नाउ नवभारत इसकी पुष्टि नहीं करता है।)

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