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हरेला क्यों मनाया जाता है? जानें हरियाली के प्रतीक इस पर्व को मनाने का कारण और दिलचस्प बातें

Harela 2026: हरेला पर्व को हरियाली का प्रतिक माना जाता है, जो कि आज 16 जुलाई को मनाया जा रहा है। खासकर, उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में इस पर्व को विशेष रूप से मनाया जाता है। आज यहां पर आप इसी पर्व से जुड़ी खास बातों के बारे में जानेंगे।

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हरेला क्यों मनाया जाता है?

Harela 2026: 16 जुलाई 2026 यानी आज गुरुवार को देशभर में हरेला का पावन पर्व मनाया जा रहा है। खासकर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में इस लोकपर्व को विशेष रूप से मनाया जाता है। इस पर्व को हरियाली और श्रावण मास की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है, जिसकी शुरुआत करीब 10 दिन पहले से हो जाती है। चलिए जानें हरेला को मनाने के कारण और इस पर्व से जुड़ी अन्य जरूरी बातों के बारे में।

हरेला किस दिन मनाया जाता है?

पौराणिक शास्त्रों में बताया गया है कि जिस दिन सूर्य ग्रह का कर्क राशि में गोचर होता है, उसी दिन हरेला का पर्व मनाना शुभ रहता है। ज्योतिषीय गणना का आकलन करें तो आज 16 जुलाई 2026 की रात 11 बजकर 44 मिनट पर सूर्य ग्रह मिथुन राशि से निकलकर कर्क राशि में गोचर करेंगे। इसी वजह से आज 16 जुलाई 2026, वार गुरुवार को हरेला का पावन पर्व मनाया जा रहा है।

हरेला कैसे मनाया जाता है?

ज्योतिष और वास्तु विज्ञान एक्सपर्ट सुजीत जी महाराज ने बताया है कि हरेला से करीब 10 दिन पहले छोटी टोकरी या मिट्टी के बर्तन में अलग-अलग तरह के अनाज के बीज बोए जाते हैं, जिनमें नियमित रूप से पानी डाला जाता है। दसवें यानी आखिरी दिन जब ये बीज हरे-पीले रंग की पत्तियों में बदल जाते हैं तो उन्हें काटा जाता है। साथ ही घर के प्रत्येक सदस्य के सिर पर रखकर उन्हें शुभकामना दी जाती है। इसके अलावा परिवार वालों की खुशहाली, लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। बता दें कि हरेला की पूजा के बाद घर में पूड़ी, खीर और छोले जैसे विशेष पकवान भी बनाए जाते हैं।

माना जाता है कि हरेले यानी बोइ गई पत्तियां जितनी ज्यादा हरी-भरी होती हैं, उतनी ही ज्यादा घर में बरकत और खुशहाली आती है। साथ ही इसे नई व अच्छी फसल से जोड़ा जाता है।

शिव-पार्वती से भी जुड़ा है हरेला महापर्व

बता दें कि हरेला का पर्व देवों के देव महादेव और माता पार्वती से भी जुड़ा है। माना जाता है कि इस पावन दिन शिव-शक्ति का मिलन हुआ था, जिस कारण हरेला को नई शुरुआत, खुशहाली और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इस दिन कुमाऊंनी परिवारों में विशेष रूप से शिव जी और माता पार्वती की पूजा की जाती है, जिनकी मूर्तियां खुद मिट्टी से बनाई जाती हैं। इसके अलावा गणेश जी की पूजा करना भी हरेला के दिन शुभ होता है।

पौधारोपण भी किया जाता है हरेला पर

हरेला का शाब्दिक अर्थ हरियाली है, जिसके कारण ये पर्व व्यक्ति को प्रकृति से भी जोड़ता है। इसी वजह से इस दिन बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया जाता है। खासकर, उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के लोग अपने घर के आसपास या खाली पड़ी जमीन पर पौधे लगाते हैं। मान्यता है कि इस दिन लगाए गए पौधे लंबे समय तक हरेभरे रहते हैं।

डिस्क्लेमर: यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। टाइम्‍स नाउ नवभारत इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है।

Nidhi Jain
निधि जैनauthor

निधि जैन Times Now नवभारत डिजिटल में सीनियर कॉपी एडिटर के तौर पर जुड़ी हैं। इन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 4 साल से ज्यादा का अनुभव है। पढ़ने और लिखने के प्रति इनकी रुचि ही इन्हें जर्नलिज्म की ओर लेकर आई। निधि अब तक हेल्थ, लाइफस्टाइल, धर्म और आध्यात्मिक विषयों पर 4,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुकी हैं।

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