Sankashti Chaturthi 2026 Vrat katha: द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा से जानें इसका महत्व, यहां पढ़ें आज की संकष्टी चतुर्थी की कहानी
- Authored by: मेधा चावला
- Updated Feb 5, 2026, 05:34 AM IST
Sankashti Chaturthi 2026 Vrat katha in Hindi (Aaj ki sankashti ki katha, kahani): 5 फरवरी 2026 को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। इस व्रत को भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय माना गया है। संकट हरने और उनकी कृपा पाने के लिए के भक्त गणपति का यह व्रत करते हैं। यहां पढ़ें द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा, द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत की कहानी। जानें आज की संकष्टी चतुर्थी की कथा क्या है।
आज की द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा हिंदी में (Pic: Pinterest)
Sankashti Chaturthi 2026 Vrat katha in Hindi (Aaj ki sankashti ki katha, kahani): पंचांग के अनुसार आज फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि है, जिसे द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस तरह 5 फरवरी 2026 को गुरुवार के दिन द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जा रहा है। यह चतुर्थी तिथि 5 फरवरी की रात 12:09 बजे से शुरू हो चुकी है। इस व्रत की तिथि का समापन 6 फरवरी 2026 की रात 12:22 बजे होगा। आज का दिन भगवान गणेश की उपासना और संकष्टी चतुर्थी व्रत के लिए खास महत्व रखता है। आगे पढ़ें आज की संकष्टी चतुर्थी की कथा। जानें द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी की कहानी क्या है।
आज की संकष्टी चतुर्थी की कथा | द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा हिंदी में
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी प्रचलित कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती ने अपने पुत्र भगवान गणेश से फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के महत्व के बारे में जानना चाहा। तब गणेश जी ने कहा—हे माता, फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। यह व्रत श्रद्धा और सेवा भाव का प्रतीक है। इसके पीछे एक प्रेरणादायक कथा प्रचलित है, जिसे मैं आपको सुनाता हूँ।
पुराने समय की बात है। युवनाश्व नाम के एक दयालु और धर्मप्रिय राजा राज्य करते थे। उसी राज्य में विष्णुशर्मा नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। उनके सात पुत्र थे, लेकिन परिवार में आपसी कलह और मतभेद के कारण सभी बेटे अलग-अलग रहने लगे। विष्णुशर्मा हर दिन बारी-बारी से अपने पुत्रों के घर भोजन करने जाया करते थे। समय के साथ वे वृद्ध और दुर्बल हो गए। उम्र बढ़ने के साथ उनका सम्मान भी कम होता चला गया और बहुएं उन्हें बोझ समझने लगीं।
एक बार संकष्टी चतुर्थी का पावन दिन आया। विष्णुशर्मा सबसे पहले बड़ी बहू के घर पहुँचे और बोले कि आज वे भगवान गणेश का व्रत करना चाहते हैं, इसलिए पूजा की थोड़ी सामग्री की व्यवस्था कर दी जाए। उन्होंने यह भी कहा कि इससे घर में गणेश जी की कृपा बनी रहेगी। लेकिन बहू ने घर के कामों का बहाना बनाकर साफ मना कर दिया। निराश होकर विष्णुशर्मा वहाँ से चले गए। इसके बाद वे एक-एक कर सभी बहुओं के घर गए, लेकिन किसी ने भी उनका सहयोग नहीं किया।
अंत में वे अपनी छोटी बहू के घर पहुंचे। वह अत्यंत निर्धन थी। उसकी आर्थिक स्थिति देखकर विष्णुशर्मा कुछ कहने में संकोच करने लगे। तभी छोटी बहू ने स्नेह और आदर के साथ अपने ससुर की बात सुनी और कहा कि वह भी उनके साथ यह व्रत करेगी। उसने सीमित साधनों के बावजूद पूरी श्रद्धा से पूजा की सामग्री जुटाई और दोनों ने विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा की।
रात्रि में व्रत खोलने के बाद इस पूजा का अद्भुत प्रभाव दिखाई दिया। भगवान गणेश छोटी बहू की सेवा भावना, श्रद्धा और सच्चे मन से किए गए व्रत से प्रसन्न हुए। धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर गया और उसका जीवन सुखमय हो गया। गणेश जी ने उसे कुबेर के समान संपत्ति का वरदान दिया।
इसीलिए मान्यता है कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत सच्चे मन और निस्वार्थ भाव से करने से व्यक्ति के कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी की गणेश जी की कहानी
बहुत पुराने समय की बात मानी जाती है। एक दिन भगवान शिव और माता पार्वती आपस में चौपड़ खेल रहे थे। खेल तो चल रहा था, लेकिन जीत-हार का फैसला करने के लिए वहाँ कोई तीसरा मौजूद नहीं था। तब दोनों ने मिलकर मिट्टी से एक छोटी-सी मूर्ति बनाई और उसमें प्राण फूंके। उस बालक को उन्होंने खेल का निर्णायक बना दिया।
खेल के दौरान अधिकतर बार माता पार्वती ही जीतती थीं, लेकिन एक बार ऐसा हुआ कि बालक ने अनजाने में भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया। यह सुनकर माता पार्वती को क्रोध आ गया। आवेश में आकर उन्होंने बालक को लंगड़ा होने का श्राप दे दिया। गलती का एहसास होते ही बालक दुखी हो गया और माता से क्षमा मांगते हुए पूछा कि वह इस श्राप से कैसे मुक्त हो सकता है।
तब माता पार्वती ने उसे उपाय बताया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ भगवान गणेश का व्रत और पूजन करता है, उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। इस व्रत के प्रभाव से न केवल श्राप कटता है, बल्कि जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं, जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सच्चे मन से मांगी गई इच्छाएं पूरी होती हैं। यही इस कथा और व्रत का सार माना जाता है।