अध्यात्म

30 अप्रैल मां छिन्नमस्ता जयंती पर कैसे करें माता की पूजा, जानिए कैसा है मां का स्वरूप और क्या है उत्पत्ति कथा

Chhinnamasta Jayanti 2026 : दस महाविद्याओं में से छठी विद्या मां छिन्नमस्ता हैं। 30 अप्रैल को मां छिन्नमस्ता जयंती मनाई जा रही है। आइए जानते हैं कि इस दिन मां को प्रसन्न कैसे करें?

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कौन हैं मां छिन्नमस्ता

Chhinnamasta Jayanti 2026 : हिंदू धर्म में दस महाविद्याओं का विशेष महत्व है और इन्हीं में छठी महाविद्या के रूप में मां छिन्नमस्ता की उपासना की जाती है। मां छिन्नमस्ता को प्रचंड चंडिका भी कहा जाता है। उनका स्वरूप जितना अद्भुत और रहस्यमय है, उतना ही गहरा उनका आध्यात्मिक संदेश भी है। साल 2026 में छिन्नमस्ता जयंती 30 अप्रैल, गुरुवार को मनाई जाएगी, जो वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर आती है। यह दिन विशेष रूप से तांत्रिक साधना, मानसिक शक्ति और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

छिन्नमस्ता जयंती 2026 तिथि और शुभ समय

साल 2026 में छिन्नमस्ता जयंती 30 अप्रैल को मनाई जाएगी। चतुर्दशी तिथि 29 अप्रैल को शाम 7 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 30 अप्रैल को रात 9 बजकर 12 मिनट तक रहेगी। इस दौरान साधक विशेष पूजा और साधना कर सकते हैं।

कौन हैं मां छिन्नमस्ता?

मां छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में एक प्रमुख देवी हैं, जिन्हें शक्ति का उग्र और रहस्यमयी रूप माना जाता है। वे आत्मबल, त्याग और अहंकार के विनाश की प्रतीक हैं। मां के इस स्वरूप की उपासना मुख्य रूप से वे साधक करते हैं जो आध्यात्मिक ऊंचाई, निर्भयता और जीवन में कठिन बाधाओं को पार करना चाहते हैं। मां का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि जीवन में सबसे बड़ी शक्ति आत्मनियंत्रण और त्याग में छिपी होती है।

कैसा है मां छिन्नमस्ता का स्वरूप?

मां छिन्नमस्ता का रूप अत्यंत अनोखा और चौंकाने वाला है। वे अपने ही कटा हुआ सिर हाथ में धारण किए रहती हैं। उनके गले से तीन धाराओं में रक्त प्रवाहित होता है, जिनमें से एक धारा वे स्वयं ग्रहण करती हैं, जबकि बाकी दो धाराएं उनकी सहेलियों जया और विजया को पोषण देती हैं। देवी नग्न अवस्था में खड़ी होती हैं और उनके चरणों के नीचे कामदेव और रति विराजमान होते हैं। यह पूरा दृश्य जीवन की मूल ऊर्जा, त्याग और नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है। उनका यह स्वरूप दर्शाता है कि इच्छाओं और अहंकार पर नियंत्रण ही सच्ची शक्ति है।

मां छिन्नमस्ता की उत्पत्ति की कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार एक बार मां पार्वती अपनी सखियों जया और विजया के साथ नदी में स्नान करने गईं। स्नान के बाद उनकी सखियों को तेज भूख लगी और उन्होंने मां से भोजन की मांग की। उस समय वहां कोई भोजन उपलब्ध नहीं था। सखियों की भूख शांत करने के लिए मां ने तुरंत अपना सिर काट लिया और उनके शरीर से निकलने वाली रक्तधाराओं से जया और विजया की भूख मिटाई। यह कथा मां के आत्मबलिदान और करुणा को दर्शाती है। इसके साथ ही यह भी संकेत देती है कि सच्चा त्याग ही सर्वोच्च शक्ति है।

मां छिन्नमस्ता के प्रमुख मंत्र

मां छिन्नमस्ता की पूजा में मंत्रों का विशेष महत्व होता है। सबसे प्रसिद्ध मंत्र ‘ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीये ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा’ है। इस मंत्र का जप श्रद्धा और नियम के साथ करने से मानसिक शक्ति बढ़ती है, भय दूर होता है और जीवन की बाधाएं कम होती हैं।

इसके अलावा बीज मंत्र 'हूं' (या 'ॐ हूं ॐ') का भी प्रयोग साधना में किया जाता है। छिन्नमस्ता गायत्री मंत्र 'ॐ वैरोचन्ये विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्' भी साधकों के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। एक अन्य मंत्र 'ॐ ह्रीं छिन्नमस्ते सर्व विघ्न उच्चाटे स्वाहा' बाधाओं को दूर करने के लिए उपयोग में लाया जाता है। वहीं षडाक्षर मंत्र 'ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं हूं फट्' को भी प्रभावशाली माना गया है।

मत्रों की साधना विधि

इन मंत्रों की साधना के लिए कुछ विशेष नियम बताए गए हैं। सामान्य रूप से सिद्ध और प्राण-प्रतिष्ठित ‘काली हकीक’ माला से निश्चित संख्या में जप करने का विधान होता है, जैसे 11 दिनों तक 114 माला या 21 दिनों तक 64 माला। माना जाता है कि इस साधना से कार्यों में सफलता मिलती है, कानूनी मामलों में सहयोग मिलता है और जीवन की बड़ी रुकावटें दूर होती हैं।

हालांकि, यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि मां छिन्नमस्ता की साधना उग्र प्रकृति की होती है। इस कारण इसे हमेशा किसी योग्य गुरु या जानकार के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए, ताकि साधना सही तरीके से हो और किसी तरह की नकारात्मक प्रभाव से बचा जा सके।

कैसे करें मां छिन्नमस्ता की पूजा?

मां छिन्नमस्ता की पूजा सामान्य पूजा से थोड़ी अलग और विशेष विधि से की जाती है। इस दिन सुबह स्नान कर साफ लाल वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर मां की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। उन्हें लाल फूल, सिंदूर, धूप और दीप अर्पित करें। इसके बाद उनके मंत्रों का जाप करें। साधक अगर तांत्रिक विधि जानते हैं तो विशेष साधना भी कर सकते हैं, लेकिन सामान्य भक्तों को केवल श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान मन को शांत रखें और किसी भी प्रकार की नकारात्मक भावना से दूर रहें। मां की उपासना से आत्मबल, साहस और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।

मां छिन्नमस्ता की पूजा से मिलते हैं ये लाभ

छिन्नमस्ता जयंती का दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण होता है जो जीवन में भय, तनाव या शत्रुओं से परेशान हैं। मां की कृपा से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और साधक को आत्मविश्वास मिलता है। यह पूजा हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में सबसे बड़ी जीत अपने मन और अहंकार पर नियंत्रण पाना है। इस प्रकार मां छिन्नमस्ता का स्वरूप भले ही उग्र दिखाई देता हो, लेकिन उनके भीतर छिपा संदेश बेहद गहरा और सकारात्मक है। उनकी उपासना से व्यक्ति को आंतरिक शक्ति, संतुलन और जीवन की कठिन परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता मिलती है।

डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।

Mohit Tiwari
मोहित तिवारीauthor

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों प्लेटफॉर्म पर काम किया है। देश-विदेश, लाइफस्टाइल, धर्म और आध्यात्मिक विषयों में गहरी रुचि रखने वाले मोहित ने ज्योतिष का भी व्यापक अध्ययन किया है। मोहित के आलेख लाइफस्टाइल, हेल्थ, न्यूज, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों पर गहरी शोध और प्रामाणिकता पर आधारित होते हैं और इन विषयों पर वह 12,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं।

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