Bhanu Saptami Vrat Katha : हिंदू धर्म में भानु सप्तमी का व्रत भगवान सूर्य नारायण (Lord Sun) को समर्पित माना जाता है। जब सप्तमी तिथि रविवार के दिन पड़ती है, तब उसे भानु सप्तमी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन सूर्यदेव की पूजा, व्रत और दान करने से व्यक्ति को आरोग्य, सुख, समृद्धि, यश और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं, भानु सप्तमी का व्रत करने से कई जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए इस दिन पूजा के साथ व्रत कथा का पाठ और श्रवण करना भी विशेष फलदायी माना गया है।
भानुसप्तमी व्रत कथा (Bhanu Saptami Vrat Katha)
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में इंदुमती नाम की एक वेश्या रहती थी। उसने अपना पूरा जीवन सांसारिक सुखों में बिताया था और कभी कोई धार्मिक कार्य या पुण्य कर्म नहीं किया था। जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ी, उसे अपने कर्मों का बोध होने लगा। उसे यह चिंता सताने लगी कि मृत्यु के बाद उसके पापों का क्या होगा और उसे मोक्ष कैसे मिलेगा।
अपने मन की इस व्यथा को लेकर वह महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुंची। उसने ऋषि के चरणों में प्रणाम करते हुए कहा, 'हे ऋषिवर! मैंने जीवनभर कोई पुण्य कार्य नहीं किया। अब मुझे अपने कर्मों पर पछतावा हो रहा है। कृपया मुझे ऐसा उपाय बताइए, जिससे मेरे पाप नष्ट हो जाएं और मुझे जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल सके।'
महर्षि वशिष्ठ ने उसकी विनती सुनकर कहा, 'हे पुत्री! भानु सप्तमी का व्रत अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। यह व्रत स्त्रियों को सौभाग्य, सुख, सुंदरता और अंत में मोक्ष प्रदान करता है। यदि तुम पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत को करोगी तथा सूर्यदेव की आराधना करोगी, तो तुम्हारे पाप नष्ट हो जाएंगे।'
सूर्य उपासना से बदल गई किस्मत
महर्षि वशिष्ठ के निर्देश के बाद इंदुमती ने भानु सप्तमी का व्रत रखना शुरू किया। वह सूर्योदय से पहले स्नान करती, सूर्यदेव को जल अर्पित करती और पूरे दिन उपवास रखकर उनकी भक्ति करती। उसने पूरी श्रद्धा के साथ सूर्य मंत्रों का जाप किया और दान-पुण्य भी किया।
कहा जाता है कि सूर्यदेव उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हो गए। भानु सप्तमी व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो गए। जब उसका जीवन समाप्त हुआ तो उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। इतना ही नहीं, स्वर्ग लोक में उसे अप्सराओं की प्रधान बनने का सम्मान भी मिला। यह कथा बताती है कि सच्चे मन से किया गया पश्चाताप और भक्ति किसी भी व्यक्ति के जीवन को बदल सकती है।
सूर्यदेव के प्राकट्य से भी जुड़ी है मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सप्तमी तिथि सूर्यदेव की प्रिय तिथि मानी जाती है। कहा जाता है कि इसी तिथि को भगवान सूर्य ने पहली बार अपने दिव्य तेज से संसार को प्रकाशित किया था। इसलिए भानु सप्तमी को सूर्यदेव का विशेष दिन माना जाता है। इस दिन की गई पूजा से व्यक्ति को स्वास्थ्य, ऊर्जा, आत्मविश्वास और सफलता का आशीर्वाद मिलता है।
श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को मिला था रोग से छुटकारा
भानु सप्तमी से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध कथा भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र सांब की है। मान्यता है कि ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण सांब कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए थे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें सूर्यदेव की उपासना करने का सुझाव दिया। सांब ने कठोर तपस्या कर सूर्यदेव को प्रसन्न किया। सूर्य भगवान की कृपा से उनका रोग दूर हो गया। तभी से सूर्य पूजा को रोगों से मुक्ति दिलाने वाली साधना माना जाता है।
भानु सप्तमी का धार्मिक महत्व
शास्त्रों में भानु सप्तमी को अत्यंत पुण्यदायी व्रत बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन सूर्यदेव को अर्घ्य देने, आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने और गेहूं, गुड़, तांबा तथा लाल वस्त्रों का दान करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। जो व्यक्ति श्रद्धा के साथ यह व्रत करता है, उसके जीवन में सुख-समृद्धि आती है, रोग दूर होते हैं और सूर्यदेव की कृपा से मान-सम्मान में वृद्धि होती है।
भानु सप्तमी की इंदुमती कथा हमें यह संदेश देती है कि जीवन में चाहे कितनी भी गलतियां हुई हों, सच्चे मन से किया गया पश्चाताप, भक्ति और सत्कर्म व्यक्ति के जीवन को नई दिशा दे सकते हैं। सूर्यदेव की कृपा से पापों का नाश होता है और मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
