Bhadrapada Purnima Shraddha 2026: भाद्रपद पूर्णिमा की तिथि बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह तिथि केवल पूर्णिमा व्रत और भगवान विष्णु की पूजा के लिए ही खास नहीं है, बल्कि पितरों के स्मरण और तर्पण के लिए भी इसका विशेष महत्व बताया गया है। जिन परिजनों या पूर्वजों का निधन पूर्णिमा तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्ध इसी दिन करने की परंपरा है। इसकी वजह यह है कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पूर्णिमा तिथि नहीं आती है, इसलिए पूर्णिमा तिथि पर होने वाला श्राद्ध भाद्रपद पूर्णिमा के दिन ही किया जाता है। आइए विस्तार से समझते हैं इस तिथि (Bhadrapada Purnima 2026) का महत्व और आज के दिन तर्पण के शुभ महुर्त...
पितृ पक्ष से पहले आती है भाद्रपद पूर्णिमा
भाद्रपद पूर्णिमा को पितृ पक्ष की पूर्व बेला भी माना जाता है। इस दिन पितरों का स्मरण, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। इसके अगले दिन से आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के साथ नियमित श्राद्ध पक्ष की शुरुआत होती है। ऐसे में भाद्रपद पूर्णिमा को पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने और उनके निमित्त धार्मिक कर्म करने का विशेष अवसर माना जाता है।
ऋषियों के तर्पण का महत्व
भाद्रपद पूर्णिमा पर केवल पितरों का ही स्मरण नहीं किया जाता, बल्कि ऋषि-मुनियों के निमित्त भी तर्पण करने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन पूर्वजों और ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने से व्यक्ति अपने पारिवारिक और आध्यात्मिक संस्कारों को स्मरण करता है। श्रद्धापूर्वक किया गया तर्पण इस दिन के धार्मिक महत्व को और बढ़ा देता है।
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भगवान विष्णु और चंद्र देव की पूजा
पूर्णिमा तिथि भगवान विष्णु और चंद्र देव की उपासना के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा करने और चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से की गई पूजा से घर में सुख-शांति और सकारात्मकता बनी रहती है। शाम के समय चंद्र दर्शन के बाद चंद्र देव को जल अर्पित किया जा सकता है।
2026 में भाद्रपद पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में पूर्णिमा तिथि 25 सितंबर की रात 11:06 बजे से शुरू होकर 26 सितंबर की रात 10:18 बजे तक रहेगी। स्नान और तर्पण के लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:36 बजे से 05:24 बजे तक बताया गया है। वहीं प्रातः पूजन के लिए सुबह 05:48 बजे से 08:12 बजे तक का समय शुभ माना गया है। चंद्रोदय का समय स्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकता है, जो लगभग शाम 05:25 बजे से 06:09 बजे के बीच बताया गया है।
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पितरों के तर्पण की विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। संभव हो तो पवित्र नदी में स्नान करें, अन्यथा घर पर स्नान के जल में गंगाजल मिलाया जा सकता है। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। तांबे या कांसे के पात्र में जल, कच्चा दूध, काले तिल, सफेद फूल और अक्षत मिलाएं। हाथ में कुश लेकर 'ॐ पितृभ्य नमः' का उच्चारण करते हुए अपने गोत्र का नाम लेकर पितरों को जल अर्पित करें। तर्पण के बाद गाय, कुत्ते, कौए, चींटियों और देवताओं के लिए भोजन का अंश निकालने की परंपरा है, जिसे पंचबलि कहा जाता है। इसके बाद श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण करें।
पूर्णिमा श्राद्ध से शुरू होता है पितृपक्ष
भाद्रपद पूर्णिमा केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों को याद करने का अवसर भी है। इस दिन किए जाने वाले तर्पण और श्राद्ध के बाद पितृ पक्ष का क्रम आगे बढ़ता है। इसलिए जिन परिवारों में पूर्णिमा तिथि पर किसी पूर्वज का निधन हुआ हो, उनके लिए यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण के साथ किए गए कर्मकांड के जरिए परिवार अपने पितरों के प्रति सम्मान व्यक्त करता है।
