अध्यात्म

Aaj ka Suvichar: टेंशन लेने से क्या होगा! पढ़ें चिंता पर कबीर जी की चेतावनी और गीता का समाधान

Aaj ka Suvichar: आज का सुविचार में पढ़ें आज की सबसे बड़ी समस्या का समाधान - टेंशन लेने से क्या होगा। कबीर जी ने अपने एक दोहे में चिंता को ऐसी डाकिनी बताया है जो इंसान को खोखला कर देती है। ऐसे में वैद्य भी काम नहीं आता। गीता में भी चिंता को व्यर्थ बताया गया है।

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चिंता से मन और शरीर दोनों खोखले होते हैं

Aaj ka Suvichar: कबीरदास जी ने अपने एक दोहे में मनुष्य के जीवन का कड़वा सच बताया है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। अपने इस दोहे में चिंता को उन्होंने डाकिनी कहा है जो भीतर ही भीतर इंसान को खोखला कर देती है। शरीर पर कोई घाव नहीं, कोई बाहरी चोट नहीं, लेकिन मन और आत्मा धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है। सबसे बड़ी बात यह कि जब बीमारी मन की हो, तो वैद्य यानी डॉक्टर भी असहाय हो जाता है। दवा शरीर को दी जा सकती है, पर बेचैन मन को कैसे शांत किया जाए?

चिंता पर कबीर जी का दोहा है -

चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए।

वैद बेचारा क्या करे, कहा तक दवा लगाए॥

आज का मनुष्य शायद कबीर की इस बात को सबसे ज्यादा जी रहा है। भविष्य की चिंता, बीते कल का पछतावा, समाज की अपेक्षाएं, असफल होने का डर - इन सबके बीच इंसान जीना भूलता जा रहा है। हम अक्सर उन चीजों के लिए परेशान रहते हैं, जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता। और यही चिंता, कबीर के शब्दों में 'कलेजा काट' लेती है।

यही संदेश हमें श्रीमद्भगवद्गीता में भी मिलता है। गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

अर्थात, तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर नहीं। फिर तुम व्यर्थ चिंता क्यों करते हो? भविष्य का फल कैसा होगा, लोग क्या कहेंगे, सफलता मिलेगी या नहीं - ये सब ईश्वर के हाथ में है। हमारा काम है केवल अपना कर्तव्य निभाना, पूरी ईमानदारी और श्रद्धा के साथ।

चिंता तब पैदा होती है जब हम वर्तमान को छोड़कर भविष्य में जीने लगते हैं। गीता यही सिखाती है कि वर्तमान क्षण में रहो। जो हुआ, उसे बदला नहीं जा सकता। जो होने वाला है, उसे पूरी तरह जाना नहीं जा सकता। लेकिन जो अभी करना है, वह हमारे हाथ में है। जब मन इस सच्चाई को स्वीकार कर लेता है, तो चिंता अपने आप ढीली पड़ने लगती है।

कबीर और गीता दोनों एक ही दिशा में इशारा करते हैं कि मन की शुद्धता और समर्पण। कबीर कहते हैं कि चिंता मनुष्य को अंदर से खा जाती है, और गीता कहती है कि समर्पण ही इसका इलाज है। जब हम अपने कर्म ईश्वर को अर्पित कर देते हैं, तब मन हल्का हो जाता है। तब जीवन बोझ नहीं, एक यात्रा बन जाता है।

आज जरूरत है खुद से यह सवाल पूछने की कि क्या मेरी चिंता सच में किसी समस्या को हल कर रही है, या सिर्फ मुझे कमजोर बना रही है? अगर जवाब दूसरा है, तो कबीर की चेतावनी और गीता का उपदेश याद रखना चाहिए। चिंता छोड़ना आसान नहीं, लेकिन संभव है। भरोसे के साथ, कर्म के साथ और भीतर की शांति के साथ।

क्योंकि सच यही है - चिंता से समस्या हल नहीं होती, लेकिन समाधान की ताकत जरूर खत्म हो जाती है।

Medha Chawla
मेधा चावलाauthor

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वाली मेधा की विशेषज्ञता हेल्थ, वेलनेस, फिटनेस, मेंटल हेल्थ, डेली लाइफ इम्प्रूवमेंट, ह्यूमन-इंटरेस्ट फीचर्स और रिसर्च-बेस्ड स्टोरीज तक फैली है। उनकी लेखन शैली पाठकों को जटिल स्वास्थ्य और जीवनशैली संबंधी विषयों को आसान, समझने योग्य और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे उनका कंटेंट व्यापक पाठक समूह से जुड़ता है। अबतक 30,000 से अधिक कंटेंट पीस लिख चुकी मेधा की कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड सेट कर चुकी हैं।

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