मार्क्स ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ट्रियर और बॉन विश्वविद्यालय से प्राप्त की, बाद में उन्होंने बर्लिन विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की। उनके शिक्षा जीवन में ही फायरबाख जैसे प्रमुख दार्शनिकों के विचारों का अध्ययन किया, और उन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
मार्क्स ने अपनी करियर की शुरुआत पत्रकारिता से की। वह 1842 में राइन समाचार पत्र के संपादक बने, जिसमें उन्होंने सरकार के खिलाफ मुखर आलोचना की। इसके परिणामस्वरूप, उनका यह समाचार पत्र बंद कर दिया गया और उन्हें फ्रांस में शरण लेनी पड़ी। वहां रहते हुए उन्होंने 'द्यूस फ्रांजोसिश' नामक समाचार पत्र में लिखा, जिसमें उन्होंने साम्यवाद के सिद्धांतों का प्रचार किया।
कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने मिलकर 1848 में 'द कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो' (The Communist Manifesto) प्रकाशित किया, जो आज भी दुनिया भर में समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलनों का मार्गदर्शन करता है। इस मैनिफेस्टो में मार्क्स और एंगेल्स ने वर्ग संघर्ष, पूंजीवाद की आलोचना और समाजवाद के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किए। उनका कहना था कि समाज का इतिहास हमेशा ही श्रमिकों और पूंजीपतियों के बीच संघर्ष का इतिहास रहा है और अंततः श्रमिक वर्ग की विजय होगी।
मार्क्स की सबसे प्रसिद्ध कृति 'दास कैपिटल' (1867) है, जिसमें उन्होंने पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का गहन विश्लेषण किया। इसमें उन्होंने पूंजी, श्रम और वस्तुओं के उत्पादन के बीच के संबंधों को समझाया। 'दास कैपिटल' के माध्यम से उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि पूंजीवाद श्रमिक वर्ग का शोषण करता है और कैसे यह व्यवस्था अंततः अपने ही अंत की ओर बढ़ती है।
कार्ल मार्क्स ने 1843 में जेनी वॉन वेस्टफालेन से विवाह किया, जिनसे उन्हें सात बच्चे हुए, जिनमें से कुछ की मृत्यु बहुत कम उम्र में हो गई। उनकी जीवनशैली आर्थिक रूप से काफी कठिन रही और उन्हें अपने परिवार की देखभाल में कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके, उन्होंने अपने जीवन के अधिकांश समय को अपने विचारों को विकसित करने और प्रकाशित करने में व्यतीत किया।
कार्ल मार्क्स जब पैदा हुए, तब उनका परिवार यहूदी था, बाद में उनके पिता ने ईसाई धर्म अपना लिया औऱ कार्ल मार्क्स भी ईसाई हो गए, हालांकि बाद में कार्ल मार्क्स नास्तिक हो गए थे। मार्क्स के अनुसार, धर्म शोषित वर्ग के लिए एक मानसिक शांति का स्रोत है, जो उनके भौतिक शोषण को सही ठहराता है। धर्म शोषण करने वाली शक्तियों द्वारा प्रकट किया जाता है ताकि गरीब वर्ग को उनके कष्टों से उबरने की बजाय उनके साथ संतुष्ट रहने के लिए प्रेरित किया जा सके। इससे समाज में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आ पाता, क्योंकि लोग अपने कष्टों को धार्मिक दृष्टिकोण से सहन करने लगते हैं।
कार्ल मार्क्स का निधन 14 मार्च 1883 को लंदन में हुआ। उनके विचारों ने 20वीं सदी के समाजवादी और साम्यवादी आंदोलनों को आकार दिया। उनके सिद्धांतों ने कई देशों में क्रांति की प्रेरणा दी और रूस, चीन, क्यूबा जैसे देशों में मार्क्सवादी शासन की स्थापना की। मार्क्स का प्रभाव आज भी जीवित है। उनके विचारों को दुनिया भर में विभिन्न तरीके से अपनाया गया है, चाहे वह राजनीतिक आंदोलन हो, आर्थिक सिद्धांत हो, या समाजिक सुधार। मार्क्स का मानना था कि समाज का इतिहास हमेशा संघर्ष का इतिहास होता है और जिस दिन श्रमिक वर्ग को अपनी शक्ति का एहसास होगा, वह सामाजिक न्याय की दिशा में क्रांतिकारी बदलाव ला सकेगा।