समुद्र के पानी के खारा होने के पीछे कई दशकों से चली आ रही जियोलॉजिकल प्रक्रिया है। बता दें कि अरबों वर्ष पहले ज्वालामुखी वायुमंडल में भाप और गैस छोड़ते थे, तो बूंदों में तब्दील होकर बादल बन जाते थे और बारिश होती थी।
बारिश का पानी थोड़ा एसिडिक होता है। जब यह पानी जमीन पर गिरता है, तो इरोजन प्रक्रिया से चट्टानों को धीरे धीरे टूटने लगती है। इससे सोडियम और क्लोराइड जैसे मिनरल पानी में घुर जाते हैं और उसे खारा बनाते हैं।
नदियां और झरने में घुले हुए मिनरल्स और नमक को बहाकर समुद्र तक ले जाता है, जो उसका पानी खारा बनाता है।
बता दें कि हर साल नमक की मात्रा थोड़ी थोड़ी बढ़ती जाती है। लाखों करोड़ों सालों से जमा हो रहे इस नमक और मिनरल्स के कारण समुद्र का पानी खारा होता जाता है।
सूरज की गर्मी के कारण वाष्पीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है। इससे समुद्र का पानी भाप बनकर उड़ जाता है, लेकिन नमक पीछे ही रह जाता है। लगातार पानी के इवैपोरेशन और बारिश के चक्र से समुद्र में नमक भी लगातार बढ़ता जाता है।
समुद्र के भीतर होने वाले ज्वालामुखी विस्फोट भी पानी में कई तरह के खनिज और नमक घोलते हैं। यह भी एक वजह है कि समुद्र का पानी खारा होता है।
औसतन समुद्र के पानी में करीब 3.5 प्रतिशत खारापन होता है, यानी हर 1 लीटर समुद्री पानी में लगभग 35 ग्राम नमक घुला रहता है।