जमीन के नीचे मिलने वाला तेल, जिसे Petroleum कहा जाता है, लाखों-करोड़ों साल पुरानी प्राकृतिक प्रक्रिया का रिजल्ट है। बहुत पहले (लाखों करोड़ो साल) समुद्रों में छोटे-छोटे जीव (प्लैंकटन, शैवाल आदि) रहते थे। जब ये मर जाते थे, तो इनके अवशेष और मरे हुए पौधों के अवशेष समुद्र की तलहटी में जमा हो जाते थे। समय के साथ इनके ऊपर मिट्टी, रेत और गाद की मोटी परतें जमती चली गईं।
इन अवशेषों पर मिट्टी और चट्टानों की मोटी परतों की वजह से बहुत ज्यादा दबाव पड़ा, जिससे बहुत सारी गर्मी बनी। हजारों-लाखों साल तक दबाव और तापमान के असर से ये जैविक अवशेष धीरे-धीरे कच्चे तेल और गैस में बदल जाते हैं। इसी प्रक्रिया को फॉसिल फ्यूल फॉर्मेशन कहा जाता है।
यह तेल चट्टानों के बीच छोटे-छोटे छिद्रों में इकट्ठा हो जाता है, जिन्हें रिजर्वायर कहा जाता है। ऊपर की कठोर चट्टान इसे बाहर निकलने से रोकती है। इंसान जमीन में गहरे छेद (ड्रिलिंग) करके इस तेल को बाहर निकालता है और फिर उसे पेट्रोल, डीजल, गैस आदि में बदलता है।
तेल बनने के लिए तापमान और दबाव का संतुलन बेहद जरूरी होता है। अगर तापमान कम हो तो यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती, और अगर बहुत ज्यादा हो जाए तो तेल के बजाय गैस बनने लगती है। यही कारण है कि तेल का निर्माण केवल कुछ खास परिस्थितियों में ही संभव होता है।
तेल हर जगह इसलिए नहीं मिलता क्योंकि इसके लिए विशेष भूगर्भीय स्थितियां जरूरी होती हैं। सबसे पहले, उस क्षेत्र में जैविक पदार्थ से भरपूर सोर्स रॉक्स होनी चाहिए। इसके अलावा, चट्टानों की ऐसी संरचना भी जरूरी होती है जो तेल को ऊपर जाने से रोककर उसे एक जगह जमा कर सके।
तेल बनने के बाद यह स्थिर नहीं रहता, बल्कि धीरे-धीरे चट्टानों के बीच से ऊपर की ओर बढ़ता है। रास्ते में जब इसे अभेद्य चट्टानों की परत मिलती है, तो यह वहीं फंसकर बड़े भंडार का रूप ले लेता है। यही प्राकृतिक भंडार बाद में ड्रिलिंग के जरिए निकाले जाते हैं।
दुनिया में तेल के बड़े भंडार कुछ ही क्षेत्रों में केंद्रित हैं, जैसे सऊदी अरब, रूस, इराक और वेनेजुएला। भारत में भी राजस्थान के बाड़मेर, गुजरात के खंभात, मुंबई हाई, असम और कृष्णा-गोदावरी बेसिन जैसे इलाकों में तेल पाया जाता है। यही वजह है कि सभी देशों के पास समान मात्रा में तेल नहीं होता और कई देशों को अपनी जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।
दुनिया में सबसे ज्यादा साबित तेल भंडार वाला देश वेनेज़ुएला है। रिपोर्टों के अनुसार, वेनेज़ुएला के पास लगभग 300+ अरब बैरल का साबित तेल भंडार है। दिलचस्प बात यह है कि वेनेज़ुएला के पास सबसे ज्यादा तेल भंडार होने के बावजूद, वह तेल उत्पादन में सबसे आगे नहीं है। इसका एक मुख्य कारण यह है कि इसका ज्यादातर तेल 'एक्स्ट्रा-हेवी क्रूड' है, जो सऊदी अरब जैसे देशों में पाए जाने वाले हल्के तेल की तुलना में गाढ़ा होता है, और जिसे निकालना व रिफाइन करना मुश्किल और महंगा होता है। इसके अलावा, वेनेज़ुएला को कई सालों तक निवेश की कमी और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर का भी सामना करना पड़ा है, जिससे उसकी उत्पादन क्षमता सीमित हो गई है।