लुप्त नदी के नाम से ही आप समझ गए होंगी की हम किस नदी की बात कर रहे हैं। जी हां... आज हम धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लुप्त हुई सरस्वती नदी के बारे में बात करेंगे और जानेंगी उस स्थान के बारे में जहां आज भी वह अपने तेज वेग के साथ बहती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सरस्वती को नदी भूमिगत यानी पाताल में बहने का श्राप मिला था। ये श्राप उन्हें भगवान गणेश द्वारा दिया गया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब महर्षि वेदव्यास महाभारत की रचना कर रहे थे और इसे भगवान गणेश द्वारा लिखा जा रहा था, उस दौरान सरस्वती नदी का शोर इतना का इस काम में बाधा आ रही थी।
गणेश जी के अनुरोध के बाद भी नदी का शोर कम नहीं हुआ और उन्होंने सरस्वती नदी को पाताल में बहने का श्राप दिया, जिसके बाद वह विलुप्त हो गई। लेकिन आज भी कुछ स्थानों पर नदी की मौजूदगी के साक्ष्य मिलते हैं। जानते है कि आज भी देश के कई स्थानों पर सरस्वती नदी के साक्ष्य हैं और उनके दर्शन किए जा सकते हैं। आइए आपको उसके बारे में बताएं।
उत्तराखंड में स्थित माणा गांव भारत का पहला गांव है। पहले इसे आखिरी गांव का दर्जा मिला था, लेकिन इसकी खूबसूरती और शांत वातावरण को देखते हुए पीएम मोदी ने इसे आखिरी नहीं बल्कि पहले गांव की उपाधि दी। इसी गांव में लुप्त हुई सरस्वती नदी की धारा देखने को मिलती है।
उत्तराखंड के माणा गांव में भीम पुल के पास स्थित केशव प्रयाग (जहां अलकनंदा और सरस्वती का संगम होता है) के पास चट्टानी दरार के बीच तेज वेग के साथ सरस्वती नदी दिखाई देती है और अलकनंदा में मिल जाती है।
बता दें कि प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में यमुना, गंगा और सरस्वती नदी का संगम होता है। कहा जाता है कि यहां सरस्वती नदी अदृश्य रूप में गंगा और यमुना से मिलती है।
पहले प्रयागराज में यमुना और गंगा से सरस्वती नदी का गुप्त संगम होता है। दूसरा उत्तराखंड के माणा गांव में अलकनंदा से नदी का संगम होता है। इसके अलावा कुछ प्राचीन मान्यताओं की मानें तो मथुरा में यमुना के साथ सरस्वती नदी का संगम होता है।