असम में जटिंगा एक अनोखा गांव है, जहां पर सितंबर से नवंबर के बीच बड़ी संख्या में स्थानीय और प्रवासी पक्षी अमावस्या की रात रिज के 1.5 किमी के इस खास इलाके में आकर बड़ी संख्या में 'आत्महत्या' करती हैं। रिज का यह इलाका ऊंचे पहाड़ों से घिरा है।
अमावस्या की रात शाम 7 से रात 10 बजे के बीच अंधेरे में, घने कोहरे के बीच हजारों की संख्या में चिड़िया यहां आकर पेड़ों, घर की दीवारों, छतों और पठार से टकराकर मर जाती हैं। दूसरे दिन सुबह लोगों को बड़ी संख्या में चिड़यों की लाशें जहां-तहां बिखरी मिलती हैं।
जटिंगा गांव डिमा हसाओ जिले में गुवाहाटी से 330 किमी दक्षिण में है और नजदीकी टाउन हाफलॉन्ग से 9 किमी दूर है। यहां करीब 25 हजार लोग रहते हैं। बादलों के बीच बसा बोरैल पहाड़ और हरियाली, जटिंगा को खूबसूरती देते हैं। यहां आने वाले पर्यटकों में वैज्ञानिक, पक्षीविज्ञानी, पक्षी विशेषज्ञ ही ज्यादा होते हैं।
आमतौर पर हर तरह की चिड़िया अंधेरा होते ही अपने घोंसलों में चली जाती हैं। रात में चिड़ियों का उड़ना सामान्य बात नहीं है। लेकिन जटिंगा में वह न सिर्फ रात में उड़ान भरती हैं, बल्कि हजारों की संख्या में जहां-तहां टकराकर आत्महत्या भी करती हैं। चिड़ियों का इस तरह का व्यवहार दशकों से रहस्य बना हुआ है।
इस तरह से सामूहिक आत्महत्या के दौरान यहां पर पक्षी भ्रमित हो जाते हैं, अनियमित व्यवहार करते हैं और आसपास कृत्रिम प्रकाश स्रोतों की ओर उड़ान भरते हैं। फिर रोशनी चाहे किसी स्ट्रीटलाइट से आ रही हो, बोनफायर या घरों की खिड़कियों से आ रही हो। ऐसा लगता है चिड़िया रोशनी के प्रति आकर्षित हो रही हैं और आखिर वह बिल्डिंगों, पेड़ों और खंबों आदि से टकराकर मर जाती हैं।
जटिंगा के आसपास कई प्रजाति की चिड़ियां होती हैं, जिनमें टाइगर बिटर्न, लिटल इग्रेट, ब्लैक बिटर्न, पोंड हेरोन, इंडिया पिट्टा और किंगशिफर यहां आकर आत्महत्या करती हैं। हालांकि, लंबी दूरी से यहां आने वाली चिड़ियों पर कोई असर नहीं होता और वह यहां आत्महत्या नहीं करतीं।
कहते हैं कि साल 1900 में पहली बार नागाओं ने चिड़ियों की आत्महत्या की इस घटना को देखा। नागा लोग मानते थे कि किसी तरह का श्राप है। 1905 में जयंतिया जनजाति के लोग यहां आते तो उन्होंने इसे श्राप की बजाय प्रकृति वरदान बताया और इन पक्षियों का मांस भी खाने लगे।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो वह यहां कि टोपोग्राफी यानी स्थलाकृति की तरफ इशारा करते हैं। यह इलाकों चारों तरफ से पहाड़ों से घिरा हुआ है। मानसून के मौसम में घने कोहरे और तेज हवाओं की वजह से पक्षी भ्रमित हो जाते हैं, जिससे उन्हें दिशा भ्रम होने लगता है। यही कारण है कि पक्षी यहां की इमारतों, पेड़ों और पहाड़ों से टकराकर मर जाते हैं। लेकिन यहां भी उनके रात में उड़ने का कोई स्पष्टीकरण नहीं है।
जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के एक शोधकर्ता डॉ. सुधीर सेन गुप्ता के अनुसार मानसून के मौसम में चट्टानों से रिसने वाले पानी और भूमिगत जल में वृद्धि के जलते यहां की मैग्नेटिक और इलेक्ट्रिकल विशेषताओं में बदलाव होता है, जिससे चिड़ियों के स्लीप पैटर्न में गड़बड़ी हो जाती है। जिससे वह रात में ही उड़ान भरने लगती हैं। मैग्नेटिग फील्ड में बदलाव के कारण उनके नर्वस सिस्टम पर प्रभाव पड़ता है, जिससे उनका व्यवहार बदल जाता है। वह कंफ्यूज हो जाती हैं और इधर-ऊधर टकराकर मर जाती हैं।
जैसा कि नागा लोगों का मानना है यह किसी तरह का श्राप है। देश भर में जिस भी व्यक्ति को जटिंगा के बारे में जानकारी है, वह इसे एक डरावनी जगह मानता है। कई पर्यटक इस डर को अनुभव करने के लिए सितंबर से नवंबर के बीच यहां जाना पसंद करते हैं।