Thought of the day: हमारी कोशिश ये रहती है कि हम आपको ऐसे प्रेरक विचारों से रूबरू करवाएं जो आपको पहले से बेहतर इंसान बन सके। ये बेहतरी ना सिर्फ सफलता के मामले में हो बल्कि समाज और रिश्तों को देखने के नजरिये में भी हो। इसी लिए हम आपके लिए रोज एक अच्छा सा सुविचार लेकर आते हैं। आज जो सुविचार हम आपके लिए लाए हैं वह रिश्तों और सामाजिक व्यवहार की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। पढ़ें आज का सुविचार:
“किसी के लिए खुली किताब मत बनो, टाइमपास का दौर है, पढ़कर फेंक दिये जाओगे”
आज का इस सुविचार का मतलब यह कतई नहीं है कि हमें लोगों पर भरोसा करना ही छोड़ दें। यह सिखाता है कि हर किसी के सामने अपने दिल, अपनी कमजोरियों और अपनी निजी बातों को पूरी तरह खोल देना समझदारी नहीं होती।
आज के समय में कई रिश्ते सुविधा पर टिके दिखाई देते हैं। लोग अकसर तब तक साथ रहते हैं, जब तक उन्हें किसी से मनोरंजन, सहारा या फायदा मिलता है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति बहुत जल्दी अपनी सारी भावनाएं, दुख, सपने और राज किसी के सामने रख देता है, तो कई बार सामने वाला उसकी भावनाओं की कद्र नहीं कर पाता। वह व्यक्ति को समझने के बजाय केवल उसका इस्तेमाल करके आगे बढ़ सकता है।
यहां खुली किताब होने का अर्थ है कि आपके जीवन का हर पन्ना हर किसी के लिए खुला हो। लेकिन हर इंसान आपकी संवेदनाओं को समझने या संभालने की क्षमता नहीं रखता। कुछ लोग आपकी बातों को सिर्फ जिज्ञासा के लिए सुनते हैं, कुछ समय बिताने के लिए और कुछ लोग बाद में उन्हीं बातों का इस्तेमाल आपके खिलाफ भी कर सकते हैं।
हालांकि इस विचार का दूसरा पहलू भी है। यह हमें कठोर या अविश्वासी बनने की सलाह नहीं देता। इसका असली संदेश यह है कि अपने जीवन में सीमाएं तय करना जरूरी है। भरोसा करें, लेकिन सोच-समझकर करें। अपने दिल की बातें उन लोगों से साझा करें जिन्होंने समय के साथ अपनी नीयत, ईमानदारी और साथ निभाने की क्षमता साबित की हो।
जीवन में हर किसी के लिए खुली किताब बनने की बजाय, कुछ पन्ने अपने लिए भी बचाकर रखना जरूरी है। क्योंकि आत्मसम्मान और भावनात्मक सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना कि किसी रिश्ते में विश्वास। समझदारी इसी में है कि हम लोगों को अपनी जिंदगी पढ़ने का मौका दें, लेकिन पूरी किताब केवल उन्हीं को सौंपें जो उसकी कीमत समझते हों।
