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स्लोवाक लीडर को भाया ठेकुआ का स्वाद, आखिर क्यों हफ्तों तक खराब नहीं होती ये बिहारी 'कुकीज'

पहले जब लंबे सफर के लिए पैकेज्ड फूड आइटम नहीं थे, तब लोग सफर में ठेकुआ लेकर चलते थे। यह न तो जल्दी खराब होता था और न ही इसे रखने के लिए किसी खास तामझाम की जरूरत होती।

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क्या हुआ जब स्लोवाकिया के बड़े नेता ने पहली बार चखा ठेकुआ। (Photo: Screen Shot)

बिहार का ठेकुआ एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल ही में स्लोवाक नेशनल काउंसिल के चेयरमैन रिचर्ड रासी ने एक वीडियो शेयर किया, जिसमें वे ठेकुआ चखते हुए नजर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने स्लोवाकिया दौरे पर ये ठेकुआ उन्हें भेंट किया था। रासी ने लिखा कि बिहार की यह पारंपरिक मिठाई उन्हें बेहद पसंद आई। इसके बाद एक बार फिर लोगों के बीच यह सवाल चर्चा में आ गया कि आखिर ऐसा क्या खास है इस साधारण दिखने वाले ठेकुए में, जो हर किसी को अपना दीवाना बना लेता है।

सबसे पहले ये जानना चाहिए कि ठेकुआ केवल एक मिठाई नहीं, बिहार की संस्कृति, आस्था और पारिवारिक परंपराओं का अहम हिस्सा है। खास बात यह है कि यह बिना फ्रिज के भी कई हफ्तों तक सुरक्षित रह सकता है और यही इसकी सबसे बड़ी खासियत मानी जाती है।

आखिर क्यों नहीं होता जल्दी खराब?

ठेकुआ की लंबी शेल्फ लाइफ के पीछे इसका बनाने का तरीका सबसे बड़ी वजह है। इसमें पानी का इस्तेमाल बहुत कम या बिल्कुल नहीं किया जाता। गुड़ या चीनी को घी के साथ मिलाकर सख्त आटा गूंथा जाता है और फिर इसे धीमी आंच पर अच्छी तरह तला जाता है। तलने की प्रक्रिया में इसकी नमी लगभग खत्म हो जाती है।

भोजन का विज्ञान कहता है कि खाने की जिन चीजों में नमी कम होती है, उनमें बैक्टीरिया और फफूंद जल्द नहीं लगते। यही कारण है कि ठेकुआ सामान्य तापमान पर भी लंबे समय तक सुरक्षित रह सकता है।

छठ महापर्व और ठेकुआ

ठेकुआ का बहुत बड़ा संबंध बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े लोकपर्व छठ से है। छठ पूजा के दौरान इसे भगवान सूर्य को चढ़ाए जाने वाले प्रमुख प्रसाद के रूप में बनाया जाता है। इस प्रसाद को पूरी पवित्रता के साथ तैयार किया जाता है। आटा, गुड़ या चीनी, देसी घी, सौंफ और नारियल जैसी साधारण सामग्री से बनने वाला यह व्यंजन स्वाद के साथ-साथ धार्मिक महत्व भी रखता है। बिहार के लगभग हर घर में ठेकुआ बनाने की अपनी अलग पारंपरिक रेसिपी होती है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहती है।

सफर का सबसे पसंदीदा साथी

आज से कई दशक पहले जब लंबी यात्राओं में पैकेज्ड फूड उपलब्ध नहीं था, तब बिहार के लोग सफर में ठेकुआ साथ लेकर चलते थे। यह न तो जल्दी खराब होता था और न ही इसे रखने के लिए किसी विशेष व्यवस्था की जरूरत पड़ती थी।

यही वजह है कि प्रवासी बिहारी परिवार आज भी विदेश जाते समय अपने साथ ठेकुआ ले जाना नहीं भूलते। ठेकुए के रूप में वो सिर्फ खाना नहीं, घर और अपनी मिट्टी की याद भी साथ ले जाता है।

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स्वाद के साथ पोषण भी

ठेकुआ में इस्तेमाल होने वाला गेहूं का आटा, गुड़, सूखे मेवे, नारियल और घी इसे ऊर्जा से भरपूर बनाते हैं। हालांकि यह मिठाई है, इसलिए इसका सेवन संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए। आजकल कई लोग इसमें बाजरा, रागी या मल्टीग्रेन आटा मिलाकर इसे और पौष्टिक बनाने की भी कोशिश कर रहे हैं।

बदलते दौर में भी कायम है लोकप्रियता

पहले ठेकुआ केवल घरों में बनता था, लेकिन अब यह देश के बड़े शहरों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी आसानी से मिल जाता है। कई बेकरी और फूड ब्रांड इसे आधुनिक पैकेजिंग के साथ बेच रहे हैं, लेकिन पारंपरिक हाथ से बने ठेकुए का स्वाद आज भी लोगों की पहली पसंद बना हुआ है।

फूड एक्सपर्ट्स का मानना है कि आज जब दुनिया पारंपरिक और स्थानीय खाद्य पदार्थों की ओर लौट रही है, तब ठेकुआ जैसे व्यंजन भारतीय खानपान की समृद्ध विरासत को दुनिया के सामने पेश कर रहे हैं।

सिर्फ मिठाई नहीं सांस्कृतिक पहचान है ठेकुआ

ठेकुआ की खासियत सिर्फ उसके स्वाद या लंबे समय तक सुरक्षित रहने में नहीं है। यह बिहार की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। बिहार का देसी कुकीज कहा जाने वाला ठेकुए हमें बताता है कि कुछ पारंपरिक चीजें समय के साथ पुराने नहीं होतीं और ज्यादा खास बन जाती हैं। शायद यही वजह है कि बिहार के गांवों से निकलकर ठेकुआ अब दुनिया के नेताओं की मेज तक पहुंच चुका है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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