रॉयल रसोई (Royal Rasoi): हिंदुस्तान की रियासतों का इतिहास खंगालेंगे तो पता चलेगा कि बहुत से महाराज, नवाब और सुल्तानों की रूह का एक हिस्सा उनकी रसोई में भी बसता था। इन्हीं में से एक नाम था रामपुर के नवाब सैय्यद हामिद अली खान का। वो अपनी शाही रसोई पर हर महीने करोड़ों खर्च कर देते थे। उनकी रसोई एक 'कुलिनरी लैबोरेटरी' थी। यहां व्यंजनों पर प्रयोग होते थे, नए स्वाद गढ़े जाते थे। सैकड़ों बावर्ची इस पाक प्रयोगशाला की जान हुआ करते।
टाइम्स नाउ नवभारत की खास सीरीज 'रॉयल रसोई' में आज हम आपको रूबरू करवाएंगे रामपुर रियासत की उसी रॉयल रसोई से जिसने बदल डाली भारतीय स्वाद की परिभाषा।
जब दिल्ली उजड़ी, तब जवान हुई रामपुर रसोई
इतिहासकार तराना हुसैन खान अपने एक रिसर्च पेपर Narrating Rampur's Cuisine: Cookbooks, Forgotten Foods, and Culinary Memories में लिखती हैं कि 1774 में स्थापित रामपुर रियासत धीरे-धीरे उत्तर भारतीय मुस्लिम संस्कृति का एक बड़ा केंद्र बन गई। खासतौर पर 1857 के बाद जब दिल्ली और दूसरे शाही दरबार बिखरने लगे, तब कई अनुभवी खानसामे रामपुर आकर बस गए। यहीं से मुगलई, अफगानी, अवधी और स्थानीय रोहिल्ला खानपान का अनूठा मेल तैयार हुआ, जिसे आज हम रामपुरी व्यंजन के नाम से जानते हैं।
नवाब के पैलेस में थी तीन बड़ी रसोइयां
20वीं सदी की शुरुआत में नवाब सैय्यद हामिद अली खान (1894–1930) के दौर में महल की रसोई में लगभग 100 रसोइये काम करते थे। रामपुर नवाब के खासबाग पैलेस के भीतर तीन रसोइयां थीं- भारतीय, अंग्रेजी और पारंपरिक मिठाइयों की। हर रसोई का अपना प्रमुख खानसामा होता था और उसके नीचे प्रशिक्षित सहायकों की पूरी टीम काम करती थी।
रामपुर के नवाब हामिद अली खान और उनका खासबाग पैलेस
वैसे रामपुर की रॉयल रसोई की खासियत वहां के खानसामों की संख्या नहीं, वह सोच थी जिसने रामपुरी व्यंजनों को भारतीय इतिहास में अमर कर दिया। यहां पर खाने, मसालों, मिठाइयों को लेकर रिसर्च भी चलती रहती थी। इसी वजह से यहां ना जाने कितने ही लाजवाब अनूठे व्यंजनों का जन्म हुआ।
अपने समय से बहुत से आगे थी रामपुर की रसोई
जब देश में अंग्रेजी और यूरोपियन खानपान से अधिकांश लोग परिचित भी नहीं थे, तब नवाब सैयद हामिद अली खान ने 1889 के आसपास अपने महल में अंग्रेजी किचन बना ली थी। इसके लिए उन्होंने अपने सबसे खास और हुनरमंद खानसामा इरशाद खान को स्पेशल ट्रेनिंग के लिए पेरिस और लंदन भेजा था।
विदेश से वहां की पाक कला में पारंगत होकर लौटे इरशाद खान ने शाही रसोई के दूसरे खानसामों और रसोइयों को ट्रेनिंग दी और देखते ही देखते महल में एक से एक उम्दा अंग्रेजी और फ्रांसीसी व्यंजन बनने लगे। महल में आने वाले विदेशी मेहमान जब इस रसोई का स्वाद चखते तो हैरान रह जाते।
इरशाद खान ने 1954 में रामपुर बाजार में ही 'रेनबो बेकरी' नाम से एक दुकान खोली जो आज भी अपनी डेनिश कुकीज के लिए मशहूर है। यह विरासत अब उनका परिवार आगे बढ़ा रहा।
वन शेफ, वन डिश
रामपुर की शाही रसोई का ढांचा आज के आधुनिक मिचेलिन स्टार होटलों से भी ज्यादा सख्त था। वहां हर शेफ का काम पूरी तरह से बंटा हुआ था। सारे शेफ किसी खास डिश में पारंगत थे। बहुत से तो ऐसे भी थे जो आजीवन एक ही डिश बनाते रहे:
चावल के उस्ताद: कुछ खानसामे ऐसे थे जो पूरी जिंदगी सिर्फ बिरयानी या पुलाव के चावल के दानों पर शोध करते थे।
कोरमा के कलाकार: इनका काम सिर्फ मीट को पकाने की आंच और मसालों के संतुलन को संभालना था।
कबाब के जादूगर: ये वो शेफ होते जो दानों और रेशों को इस कदर पीसते थे कि कबाब मुंह में जाते ही घुल जाएं।
फूड क्रिटिक मधुलिका दास ने द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने लेख में बताया है कि नवाब अपने खानसामों को केवल पारंपरिक व्यंजन बनाने तक सीमित नहीं रखते थे। वह उन्हें नए और अनोखे प्रयोग करने के लिए पूरा बजट और आजादी देते थे।
करोड़ों का खर्च सिर्फ शौक नहीं था
आज सुनने में अजीब लग सकता है कि एक शाही परिवार की रसोई पर आज के हिसाब से हर महीने करोड़ों रुपये के बराबर खर्च होता था। यहां ध्यान देने वाली बात है कि यह खर्च केवल नवाब साहब के निजी भोजन पर नहीं था।
नवाब हामिद अली खान की बेटी मेहरुन्निसा बेगम ने अपने संस्मरण में पिता की शाही रसोई के बारे में लिखा है कि महल की भारतीय रसोई पर सालाना लगभग 2.5 लाख रुपये, जबकि अंग्रेजी रसोई पर करीब 1.5 लाख रुपये खर्च किए जाते थे। दोनों खर्च को जोड़ कर आज से तुलना करें तो ये लगभग 12 करोड़ रुपए बैठता है।
फेमस फूड हिस्टोरियन के. टी. आचार्य अपनी किताब इंडियन फूड: अ हिस्टोरिकल कैम्पेनियन (Indian Food: A Historical Companion) में लिखते हैं कि उस दौर में रियासतों की रसोइयां केवल भोजन तैयार नहीं करती थीं, वे सत्ता, कूटनीति और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन थीं। किसी नवाब की समृद्धि और उसके राजनीतिक रसूख का अंदाजा इस बात से लगाया जाता था कि उसकी दावतों में मेहमानों को कितने नए और महंगे पकवान परोसे जा रहे हैं। रामपुर के नवाब हामिद अली खान को इसमें महारथ हासिल थी।
मुगलई और अवधी से कैसे अलग हुआ रामपुरी स्वाद?
रामपुर नवाब की रॉयल खानपान की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यहां मसालों का इस्तेमाल बेहद संतुलित तरीके से किया जाता था। स्लर्प (Slurrp) की फूड हिस्ट्री पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार, रामपुरी व्यंजनों में दही, कच्चे मसाले, पीली मिर्च, चंदन, कच्चा पपीता और लौकी जैसी चीजों का खास महत्व था।
खास बात यह भी थी कि पारंपरिक रामपुरी व्यंजनों में टमाटर का इस्तेमाल लगभग नहीं के बराबर होता था। यही कारण है कि रामपुरी कोरमा और कबाब का स्वाद लखनऊ या दिल्ली के मुगलई व्यंजनों से अलग माना जाता है।
| विशेषता | दिल्ली (मुग़लई) | लखनऊ (अवधी) | रामपुर (रामपुरी) |
| मुख्य आधार (Base) | काजू, बादाम और भारी मलाई का पेस्ट। | केसर, केवड़ा और दमपुख्त (धीमी आंच) शैली। | दही, कच्चे मसाले और चंदन का बुरादा। |
| तीखापन / मिर्च | लाल मिर्च और गरम मसालों का तीखा स्वाद। | बेहद हल्का और मीठापन लिए हुए स्वाद। | पीली मिर्च का इस्तेमाल (जो तीखापन नहीं, सोंधापन देती है)। |
| टमाटर का उपयोग | ग्रेवी को गाढ़ा करने के लिए आम। | सीमित उपयोग। | लगभग शून्य (पारंपरिक व्यंजनों में टमाटर वर्जित था)। |
आज भी जिंदा हैं रामपुर की रसोई के खास खुशबू
फेमस शेफ रणवीर बरार कई बार कह चुके हैं कि भारत की शाही रसोइयों सिर्फ स्वाद ही नहीं, इतिहास, भूगोल और संस्कृति को भी एक प्लेट में परोसती थीं। उनके अनुसार किसी भी पारंपरिक व्यंजन को समझने के लिए उसकी कहानी जानना उतना ही जरूरी है, जितना उसकी रेसिपी। यह बात रामपुर की रसोई पर पूरी तरह लागू होती है। आज भी रामपुर की इस 'पाक प्रयोगशाला' से निकले कई व्यंजन पूरी दुनिया में मशहूर हैं:
तार कोरमा: मीट की चर्बी से निकलने वाले प्राकृतिक रोगन (तार) से बनने वाली एक गाढ़ी ग्रेवी।
दूधिया बिरयानी: इसमें मसालों के तीखेपन को कम करने के लिए चावल को दूध में पकाया जाता था।
अदरक का हलवा : सर्दियों में शरीर को गर्म रखने के लिए बनाया गया एक अनोखा और स्वादिष्ट डेजर्ट।
कच्चे गोश्त की टिकिया: कबाब का एक ऐसा रूप जो तवे पर बिना उबाले सीधे सेंका जाता था।
नवाब हामिद अली खान के बाद कम होती गई रसोई की रौनक
नवाब सैयद हामिद अली खान के दौर में महल की रसोई में जहां करीब 100 खानसामे काम करते, बाद में नवाब रजा अली खान के समय यह संख्या घटकर करीब 30 शेफ और कई सहायक रसोइयों तक रह गई। आजादी के बाद तो रसोई में महज मुठ्ठी भर रसोइये ही बचे।
आजादी के बाद कम होती गई रामपुर के रसोई की रौनक
रामपुर की पूरी पाक विरासत को समझने के लिए माजिद भाई की कहानी जानना भी जरूरी है। वो 1966 में अपने पिता के साथ महल की रसोई में ट्रेनी के रूप में शामिल हुए थे। बाद में वे रामपुर के शाही परिवार के अंतिम प्रमुख खानसामों में गिने गए।
अल जजीरा के लिए लिखते हुए इतिहासकार तराना हुसैन खान बताती हैं कि माजिद भाई ने वह दौर देखा, जब शाही रसोई की रौनक धीरे-धीरे खत्म होने लगी। 1971 में प्रिवी पर्स समाप्त होने और संपत्ति विवादों के बाद आर्थिक कठिनाइयों ने इस विशाल रसोई को बुरी तरह से प्रभावित किया।
आर्थिक तंगी का दौर आया, जिसने इस विशाल रसोई के चूल्हों को हमेशा के लिए शांत कर दिया। लेकिन माजिद भाई ने अपनी यादों और उंगलियों के हुनर में इस पाक विरासत को आखिरी सांस तक जिंदा रखा।
रामपुर के नवाब सैयद हामिद अली खान ने जो शाही रसोई जमाई थी वो आज इतिहास की किताबों में दर्ज एक किस्सा भर नहीं है। वह भारतीय पाक विरासत का ऐसा अध्याय है, जिसकी खुशबू आज भी हिंदुस्तानी व्यंजनों में महसूस की जा सकती है।
