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शाही टुकड़ा: ब्रेड से बनी इस मिठाई को मिला नवाबी टच, जानें शाही क्यों कहलाया ये 'टुकड़ा'

शाही टुकड़ा स्वाद में जितना लाजवाब है, उतना ही समृद्ध भी। इसे बनाने में घी, चीनी, रबड़ी और सूखे मेवों का भरपूर इस्तेमाल होता है। यही कारण है कि यह ऊर्जा से भरपूर मिठाई मानी जाती है।

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कहानी शाही टुकड़े की (Photo: iStock)

शाही टुकड़ा (Shahi Tukda): अगर कोई आपसे कहे कि ब्रेड जैसी साधारण चीज से ऐसी मिठाई बन सकती है, जो कभी नवाबों और बादशाहों की दावत की शान हुआ करती थी, तो शायद यकीन करना मुश्किल हो। लेकिन शाही टुकड़ा की कहानी कुछ ऐसी ही है। यह मिठाई बस अपने स्वाद की वजह से खास नहीं है। ये इसलिए भी खास है कि इसमें भारत के औपनिवेशिक दौर, मुगलई रसोई और हिंदुस्तानी हुनर, तीनों की झलक दिखाई देती है।

आज शाही टुकड़ा ईद, शादियों और खास मौकों की लोकप्रिय मिठाई है, लेकिन इसकी शुरुआत उस ब्रेड से हुई थी, जो कभी भारतीय रसोई का हिस्सा ही नहीं थी।

जब भारत पहुंचा ब्रेड

भारत में रोटी, पराठा, नान और कुलचा सदियों से खाए जाते रहे हैं, लेकिन ब्रेड का चलन ब्रिटिश शासन के दौरान तेजी से बढ़ा। अंग्रेज अपने साथ बेकरी कल्चर लेकर आए और बड़े शहरों में ब्रेड आसानी से मिलने लगी। धीरे-धीरे यह शाही रसोइयों तक भी पहुंच गई।

भारतीय खानसामों की खासियत हमेशा से यही रही है कि वे विदेशी सामग्री को भी स्थानीय स्वाद में ढाल देते थे। ब्रेड के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

ब्रेड बन गई शाही मिठाई

शाही रसोइयों ने ब्रेड के टुकड़ों को देसी घी में सुनहरा तलना शुरू किया। फिर उन्हें केसर और इलायची वाली चाशनी में डुबोया गया। ऊपर से गाढ़ी रबड़ी, बादाम, पिस्ता और चांदी का वर्क लगाया गया।

एक साधारण ब्रेड का टुकड़ा देखते-देखते ऐसी मिठाई में बदल गया, जिसे शाही दावतों में परोसा जाने लगा। यही वजह है कि इसका नाम पड़ा- शाही टुकड़ा। यानी ऐसा टुकड़ा जो शाही रसोई की पहचान बन गया।

क्या यह पूरी तरह भारतीय मिठाई है?

इतिहासकारों का मानना है कि शाही टुकड़े की जड़ें केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। मुगलकाल के दौरान मध्य एशिया और फारस से कई व्यंजन भारतीय रसोई में आए। माना जाता है कि शाही टुकड़ा भी पश्चिम एशिया की ब्रेड पुडिंग परंपरा से प्रभावित है। भारत आने के बाद इसमें देसी घी, रबड़ी, केसर और मेवों का ऐसा मेल हुआ कि यह पूरी तरह भारतीय पहचान वाली मिठाई बन गई।

हैदराबाद में कहलाता है 'डबल का मीठा'?

अगर आप हैदराबाद जाएंगे, तो यही मिठाई आपको 'डबल का मीठा' नाम से मिलेगी। दरअसल, पुराने समय में ब्रेड को 'डबल रोटी' कहा जाता था। उसी 'डबल' से यह नाम निकला। हालांकि उत्तर भारत में इसे शाही टुकड़ा कहा गया, जबकि हैदराबाद ने अपनी स्थानीय शैली में इसे नया नाम दे दिया। दोनों में सामग्री लगभग एक जैसी होती है। बस बनाने और परोसने के तरीके में थोड़ा अंतर होता है।

सावधानी से खाइए..क्यों?

शाही टुकड़ा स्वाद में जितना लाजवाब है, उतना ही समृद्ध भी। इसे बनाने में घी, चीनी, रबड़ी और सूखे मेवों का भरपूर इस्तेमाल होता है। यही कारण है कि यह ऊर्जा से भरपूर मिठाई मानी जाती है। पहले इसे रोजमर्रा के भोजन की बजाय त्योहारों, शादियों और शाही दावतों के लिए तैयार किया जाता था।

आज भी पोषण विशेषज्ञ इसे सीमित मात्रा में खाने की सलाह देते हैं, खासकर उन लोगों को जो मधुमेह, मोटापे या हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हों।

शाही टुकड़ा इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि भारतीय रसोई ने विदेशी प्रभावों को कैसे अपनाया और उन्हें अपनी पहचान दे दी। अंग्रेजों के साथ आई ब्रेड जब मुगलई और नवाबी रसोई तक पहुंची, तो उसने ऐसा रूप लिया कि आज उसे भारतीय पारंपरिक मिठाइयों में गिना जाता है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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