Bhojpuri Sawan Songs (सावन के भोजपुरी गीत): सावन का महीना आते ही भोजपुरी अंचल की धरती हरियाली ओढ़ लेती है। बादलों की गरज, माटी की सोंधी खुशबू और रिमझिम बारिश के बीच गांव की गलियों से लेकर चौपालों तक एक अलग ही संगीत गूंजने लगता है। यह संगीत होता है भोजपुरी लोकगीतों का संगीत। ये गीत सिर्फ स्वर नहीं होते, बल्कि ऋतु, प्रेम, विरह और भक्ति के बीच झूलते लोकजीवन के भाव होते हैं।
सावन में गाए जाने वाले प्रमुख भोजपुरी लोकगीतों की परंपरा बहुत पुरानी है और यह आज भी गांवों में जीवित है। सावन को नारी मन की सबसे संवेदनशील ऋतु माना गया है और लोकगीतों में यह संवेदना मुखर होती है। आइए डालते हैं सावन में गाए जाने वाले भोजपुरी लोकगीतों पर एक नजर:
Sawan Bhojpuri Geet | Bhojpuri Lokgeet Sawan
1. कजरी गीत
कजरी भोजपुरी लोकगीतों का सबसे लोकप्रिय रूप है, जो विशेषकर सावन महीने में गाया जाता है। इसे सावन का श्रृंगार भी कहा जाता है। ये गीत आमतौर पर युवतियों द्वारा झूले पर झूलते हुए गाए जाते हैं। इनमें प्रेम, विरह और ऋतु की सुंदरता का बखान होता है।
2. झूला गीत
जब अमराइयों में झूले पड़ते हैं और महिलाएं समूह में झूलती हैं, तब झूला गीत गाए जाते हैं। इन गीतों में सावन की रिमझिम बारिश, हरियाली और स्त्री के सजने-संवरने की बात होती है। ये गीत ग्रामीण स्त्रियों के आंतरिक आनंद और सामूहिकता के प्रतीक होते हैं।
3. विरह गीत
सावन को प्रेम का महीना भी माना गया है। लेकिन जब किसी का साजन इस सावन में उससे दूर हो तो यह विरह का महीना बन जाता है। ऐसे में विरह गीतों की स्वर-धारा गहरी होती है। इन गीतों में स्त्रियों की आत्मा की पीड़ा उभरती है – एक ऐसा भाव जो मन को भिगो देता है।
4. हरियाली गीत
सावन में ही आती है हरियाली तीज। और इस हरियाली तीज पर गाए जाने वाले इन हरियाली गीतों में पेड़-पौधे, फसल, माटी और गांव के जीवन का उल्लास होता है।
5. भोले के भक्ति गीत
सावन शिव भक्ति का महीना भी है। इस दौरान गांवों में गूंजते हैं भोले बाबा के गीत, जिनमें गहरी भक्ति और लोकधुन की सादगी होती है। इन गीतों में श्रद्धा और संगीत का संगम होता है जो दिल को छू जाता है।
बता दें कि भोजपुरी के लोकगीत मिट्टी से जुड़े हुए, आत्मा से निकले हुए और लोक जीवन की थिरकन से सजे हुए होते हैं। बदलते समय में भले ही इन गीतों की आवाज़ थोड़ी मंद हो गई हो, लेकिन जब भी सावन आता है, ये गीत फिर से यूं जी उठते हैं जैसे धरती अपने पुराने किस्से गा रही हो।
