नागालैंड के घने जंगल और जंगलों के बीच एक सुनसान गांव। कभी इस गांव में जिंदगी हुआ करती थी, घरों में चूल्हे जलते थे, बच्चे खेलते थे और गांव की अपनी दुनिया थी। अब गांव लगभग खाली हो चुका है। कुछ लोग नई बस्ती में चले गए हैं। उनके साथ नई आस्था, नए कपड़े, नया जीवन और एक नया भविष्य जुड़ गया है। पीछे रह गया है एक बुजुर्ग शख्स, उसकी बीमार पत्नी और जवान बेटा। इन्हीं तीनों के इर्द-गिर्द घूमती है फिल्म आंग (Angh) की कहानी।
नागालैंड के फिल्ममेकर तेजा रियो की फिल्म आंग 1960 के दशक के कोन्याक समाज में हुए बड़े सामाजिक फेरबदल की कहानी है। भारत की तरफ से इस फिल्म को इस साल Oscars के लिए भेजा गया है। कहानी नागालैंड के कोन्याक नागा समाज और वहां के आंगों पर बुनी गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कोन्याक नागा कोन होते हैं? इनके यहां आंग किन्हें कहा जाता है? आइए विस्तार से समझते हैं:

कोन्याक समाज के आंग की कहानी है Angh (Photo: canva)
सिर काट लेने वाले कोन्याक
नागालैंड के मोन जिले के लॉन्गवा और उसके आसपास के करीब 70 गांवों कोन्याक नागा रहते थे। कोन्याक नागा समाज भारत की सबसे रहस्यमयी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध जनजातियों में से एक रही है। आज भी अगर आप इनके गांवों में जाएंगे तो आपको पीतल की मालाएं पहने, कानों में सींगों के आभूषण डाले और चेहरों पर नीले रंग के गोदने उकेरे बुजुर्ग योद्धा मुस्कुराते हुए मिल जाएंगे। किसी जमाने में यही चेहरे दुश्मन कबीलों के दिलों में खौफ पैदा करते थे।
दरअसल कोन्याक नागाओं को 'हेड हंटर्स' कहा जाता था। हेड हंटर्स मतलब सिर काट लेने वाले लड़ाके। कोन्याक मानते थे कि इंसान के कपाल (सिर) में एक जादुई आत्मा और समृद्धि का वास होता है। जब कोई योद्धा दुश्मन का सिर काटकर गांव लाता, तो ढोल की थाप पर पूरा गांव जश्न मनाता। माना जाता था कि उस सिर के आने से खेतों में धान की फसल लहलहा उठेगी और गांव पर कोई विपत्ति नहीं आएगी।
अपने कबीले की रक्षा के लिए दुश्मनों का सिर काट कर गांव लाने वाले वीर योद्धाओं को सम्मान के तौर पर चेहरे पर गोदना गुदवाने यानी कि टैटू बनवाने का हक मिलता था। चेहरे पर छपी वह स्याही उस योद्धा का सबसे बड़ा तमगा थी। जिसके चेहरे पर जितना ज्यादा टैटू, समाज में उसकी उतनी ही ऊंची साख। हालांकि समय के साथ हवा बदली। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में जब आधुनिकता और ईसाई धर्म का आगमन हुआ, तो हिंसा और युद्ध का यह दौर हमेशा के लिए थम गया। खूंखार माने जाने वाले योद्धाओं ने 1960 में हथियार छोड़कर शांति और सौहार्द का रास्ता चुन लिया।

हेड हंटर्स कहलाते थे कोन्याक (Photo: iStock)
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कोन्याक नागाओं में कौन होते हैं 'आंग'
आंग कबीले के मुखिया को कहा जाता है। एक जमाने में आंग कोन्याक कबीले की आत्मा, न्याय के प्रतीक और लोगों के लिए ईश्वर का भेजा हुआ एक ऐसा दूत हुआ करते था, जिनके एक इशारे पर सैकड़ों योद्धा अपनी जान देने को तैयार हो जाते। आंग का पद पीढ़ी-दर-पीढ़ी खून के रिश्ते से मिलता था। माना जाता था कि आंग के भीतर एक खास दैवीय शक्ति होती है, जो पूरे गांव को खुशहाली और सुरक्षा देती है।
आंग का रुतबा इतना बड़ा था कि आम लोग उनके सामने आंख उठाकर देखने की हिम्मत भी नहीं करते थे। अपने वंश की शुद्धता और शाही खून को बनाए रखने के लिए, मुख्य आंग हमेशा किसी दूसरे बड़े आंग परिवार की राजकुमारी से ही शादी करते थे। ये आंग अपने विशाल घर से पूरे गांव की हुकूमत चलाते थे। उनके काम करने का तरीका बड़ा अनोखा था।
अगर गांव में कोई विवाद होता, तो मामला आंग की अदालत में जाता। उनका फैसला अंतिम होता था, जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता था। इसके अलावा किस कबीले से जंग लड़नी है और कब शांति का पैगाम भेजना है, इसका निर्णय केवल आंग ही लेते थे। जब आंग का हुक्म होता, तभी योद्धा अपने भाले और दाव उठाकर निकलते थे।
गांव की सारी जमीन आंग की छत्रछाया में होती थी। जब भी खेतों में धान की पहली फसल कटती या जंगल में किसी बड़े जानवर का शिकार होता, तो उसका सबसे बेहतरीन हिस्सा आंग के महल में भेंट के तौर पर भेजा जाता था।

कोन्याक नागाओं में सबसे ताकतवर होते थे आंग (Photo: Canva)
आज भी कायम है आंग का जादू
समय बदला, भारत आजाद हुआ और प्रजातंत्र की हवा इन पहाड़ियों तक पहुंची। सरकारें बनीं और कानून लागू हुए, जिससे आंग की राजनीतिक ताकत भले ही पहले जैसी नहीं रही। हालांकि आज भी जब आप नागालैंड के मोन जिले के गांवों में जाएंगे, तो पाएंगे कि कोन्याक नागाओं के दिलों से अपने आंग के लिए सम्मान कम नहीं हुआ है। आज भी गांव का कोई बड़ा सामाजिक या सांस्कृतिक फैसला आंग की मर्जी के बिना नहीं लिया जाता।
मिशनरियों के आने से बदल गया सब
19वीं सदी के शुरुआत में ही ईसाई मिशनरी भारत के सुदूर इलाकों तक पहुंच गए थे। ये लोग गरीब आदिवासी और जनजातियों को ईसाई धर्म से जोड़ते थे। नागालैंड के दुर्गम मोन जिले और कोन्याक नागा समाज में भी ये मिशनरी पहुंचे। इनका पहुंचना कोन्याक समाज के धार्मिक इतिहास में एक अहम मोड़ साबित हुआ।
हुआ ये कि 1960 के दशक में पूरे नागालैंड में एक व्यापक ईसाई पुनर्जागरण आंदोलन फैला, जिसे 'द ग्रेट अवेकनिंग मूवमेंट' कहा गया। इस आंदोलन ने लोगों की आस्था और सोच को पूरी तरह बदल दिया। लोगों को बेहतर जीवन, बेहतर शिक्षा और मुख्य धारा से जोड़ने की बात कहते हुए उन्हें ईसाई बनाया जाने लगा। बहुत से लोग अपनी स्वेच्छा से ईसाई बने तो बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी थी जो आसपास के समाज के प्रभाव में आकर अपनी पुरानी आस्था से अलग हुए।

मिशनरियों ने बदल कर रख दी पहचान (AI Image)
कोन्याक नागा समाज के आंगों और कबीले के बुजुर्गों ने बैपटिस्ट ईसाई मिशन के प्रभाव में आकर ईसाई धर्म स्वीकार किया, तो उनके फैसले से प्रेरित होकर पूरे के पूरे गांवों ने सामूहिक रूप से अपनी पुरानी मान्यताओं को छोड़कर ईसाई धर्म अपना लिया। जंगलों से निकलकर शहरों की तरफ ये लोग बसने लगे। हालांकि इनमें से कुछ आंग ऐसे भी थे जिन्होंने अपनी आस्था का सौदा करना सही नहीं समझा। वो मिशनरियों के हर प्रलोभन से दूर रहे।
ऑस्कर तक पहुंची कन्याक नागाओं की कहानी
ऑस्कर 2027 के लिए नॉमिनेट होने वाली तेजा रियो की फिल्म आंग भी ऐसे ही अंगबा नाम का एक बुजुर्ग आंग की कहानी है। उसका गांव लगभग खाली हो चुका है। ज्यादातर लोग वहां से जा चुके हैं, लेकिन अंगबा अपनी बीमार पत्नी और बेटे के साथ वहीं रह रहा है। वह उन आखिरी लोगों में है जो अपनी पारंपरिक आस्था और पुराने जीवन तरीके को छोड़ना नहीं चाहते।
अमेरिकी बैपटिस्ट मिशनरी उसके गांव में अपने साथ ऐसी सुविधाएं और जीवन का एक नया तरीका लेकर पहुंचते हैं, जो अंगबा के बेटे को आकर्षित करने लगता है। अंगबा अपने बेटे को उस दुनिया में जाते देख रहा है जिसे वह खुद स्वीकार नहीं कर पा रहा। दूसरी तरफ बेटा भी बदलती दुनिया की सुविधाओं और संभावनाओं से प्रभावित है। यहीं से पिता और बेटे के बीच एक भावुक टकराव शुरू होता है।
फिल्म अपने साथ हर किसी के मन में यह सवाल छोड़ जाती है कि जब दुनिया बदल रही हो तो आप बतौर इंसान अपनी पहचान, अपनी आस्था और अपनी जड़ों को कितनी दूर तक बचा सकते हैं।
