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Rabindranath Tagore Poems: टैगोर की कविताओं में छिपा है जीवन का गहरा संदेश, दिल को जाएंगी छू

Rabindranath Tagore Poems: रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं सरल शब्दों में गहरी बातें कहती हैं। उनकी रचनाएं आज भी स्कूलों, कॉलेजों और साहित्य प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। उनकी कविताएं जीवन को समझने के लिए भी जानी जाती हैं।

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रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं (AI Image)

Rabindranath Tagore Poems: रवीन्द्रनाथ टैगोर भारतीय साहित्य की आत्मा माने जाते हैं। टैगोर की कविताओं में प्रकृति, प्रेम, देशभक्ति, मानवता और जीवन की गहरी बातें देखने और सीखने को मिलती हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) देश के राष्ट्रगान 'जन गण मन' के रचयिता हैं। टैगोर महान कवि, लेखक, चित्रकार, दार्शनिक और लघु कथाकार थे। टैगोर पहले एशियाई व्यक्ति थे जिन्हें साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। उनकी रचनाएं आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं। अगर आप हिंदी में उनकी बेहतरीन कविताएं पढ़ना चाहते हैं, तो ये 5 कविताएं जरूर पढ़ें।

1- लुका-छिपी

यदि मैं शरारत करूं

फूल बनकर चम्पा के वृक्ष पर जा खिलूं

किसी भोर बेला में डाली पर हिलने-डुलने लगूं

तब तो मां तुम मुझसे हार जाओगी

मां तब क्या तुम मुझे पहचान सकोगी

तुम पुकारोगी मुन्ना कहां गया रे

और मैं चुपचाप केवल हंसूंगा

जब तुम किसी काम में लगी रहोगी

तब मैं आंखें खोले हुए सब-कुछ देखूंगा

स्नान करके तुम चम्पा के नीचे से

निकलोगी पीठ पर केश फैलाए हुए

वहां से पूजा-घर में जाओगी

तब तुम्हें दूर से फूल की सुगंध आएगी

किंतु तुम समझ नहीं पाओगी

कि सुगंध तुम्हारे मुन्ना के शरीर से आ रही है

सबको खिला-पिलाकर दुपहर में

तुम महाभारत लेकर बैठोगी

कमरे की खिड़की से वृक्ष की छाया

तुम्हारी पीठ और गोद में पड़ेगी

मैं तुम्हारी पुस्तक पर आ झुलाऊंगा

अपनी नन्ही-सी छाया

क्या तुम समझ सकोगी

तुम्हारी आंखों में मुन्ना की छाया तैर रही है

सांझ को दिया जलाकर

जब तुम गाय की सार में जाओगी

तब मैं फूल का यह खेल समाप्त करके

टप से धरती पर टपक पडूंगा

और फिर से तुम्हारा मुन्ना बन जाऊंगा

तुम्हारे पास आकर कहूंगा कहानी सुनाओ

तुम पूछोगी तू कहां गया था रे नटखट

मैं कहूंगा सो मैं नहीं बताऊंगा।

2- खो जाना

छोटी-सी मेरी बिटिया

सखियों की पुकार सुनकर

सीढ़ी के रास्ते निचले तल्ले की ओर उतर रही थी

अंधेरे में, डरती-डरती, रुक-रुककर।

हाथ में था दीया,

आंचल से ओट करके सावधानी से चल रही थी।

मैं था छत के ऊपर

तारा-खचित चैत मास की रात में।

अचानक बिटिया की रुलाई सुनकर, उठकर

देखने गया दौड़कर।

सीढ़ी से जाते-जाते

हवा से उसका दीया बुझ गया था।

पूछा उससे, क्या हुआ बामी?

नीचे से रोकर उसने कहा, मैं खो गई हूँ।

ताराओं से भरी चैत मास की रात में

छत पर लौटकर

मन में आया आकाश की ओर देखकर,

मेरी बामी के समान और कोई एक लड़की मानो

नीलाम्बर के आंचल से ढंककर

दीपशिखा को बचाती हुई अकेली चली जा रही है धीरे-धीरे।

अगर बुझ जाता वह प्रकाश,

अगर अचानक रुक जाती वह,

सारा आकाश रो उठता, मैं खो गया हूं।

3- मुक्ति

वैराग्य-साधन के द्वारा मुक्ति मेरे लिए नहीं है

मैं असंख्य बंधनों में

महाआनंदमय मुक्ति का स्वाद लूंगा

इस वसुधा के मिट्टी के पात्र में बार-बार

तुम्हारा नाना वर्ण गंधमय अमृत निरंतर ढालता रहूंगा

सारा संसार दीपक के समान मेरी लक्ष-लक्ष वर्त्तिकाओं को

तुम्हारी ही शिखा से छूकर तुम्हारे मंदिर में प्रज्ज्वलित कर देगा

इंद्रियों के द्वार रुद्ध करके

योगासन मेरे लिए नहीं है

जो कुछ भी आनंद है दृश्य गंध और खाने में

तुम्हारा आनंद उसी में निवास करेगा

मेरा मोह मुक्ति बनकर जल उठेगा

मेरा प्रेम भक्ति बनकर फलेगा।

4- प्रार्थना

चित्त जहां भय शून्य, शीश जहां उच्च है

ज्ञान जहां मुक्त है, जहां गृह-प्राचीरों ने

वसुधा को आठों पहर अपने आंगन में

छोटे-छोटे टुकड़े बनाकर बंदी नहीं किया है

जहां वाक्य उच्छ्वसित होकर हृदय के झरने से फूटता

जहां अबाध स्रोत अजस्र सहस्रविधि चरितार्थता में

देश-देश दिशा-दिशा में प्रवाहित होता है

जहाँ तुच्छ आचार का फैला हुआ मरुस्थल

विचार के स्रोत पथ को सोखकर

पौरुष को विकीर्ण नहीं करता

सर्व कर्म चिंता और आनंदों के नेता

जहां तुम विराज रहे हो

हे पिता अपने हाथ से निर्दय आघात करके

भारत को उसी स्वर्ण में जागृत करो।

5- हिंसक रात चुपके-चुपके आती है

हिंसक रात चुपके-चुपके आती है

दुर्बल हुए शरीर की कमज़ोर कुंडी को तोड़कर

अंतर में प्रवेश करती है।

जीवन के गौरव के रूप का हरण करती रहती है।

कालिमा के आक्रमण से मन हार मानता है।

इस पराजय की ग्लानि, इस अवसाद का अपमान

जब गाढ़ा हो उठता है, सहसा दिगंत में

स्वर्ण-किरणों की रेखांकित पताका दिख जाती है।

आसमान के मानो किसी दूर केंद्र से

मिथ्या-मिथ्या की ध्वनि उठती है।

प्रभात के खुले प्रकाश में

अपनी जीर्ण देह के दुर्ग-शिखर पर

दुख-विजयी की मूर्ति को देखता हूं।

prabhat sharma
प्रभात शर्माauthor

प्रभात शर्मा टाइम्स नाउ हिंदी डिजिटल के फीचर डेस्क में कार्यरत ट्रैवल और लाइफस्टाइल राइटर हैं। यात्राओं के प्रति उनका गहरा जुनून और नई जगहों को समझने–परखने की क्षमता उनकी लेखन शैली को बेहद जीवंत और पाठकों से जोड़ने वाली बनाती है। वे ऑफबीट डेस्टिनेशन, लोकल कल्चर, हेरिटेज साइट्स, रोड ट्रिप्स, फूड जर्नी और बजट ट्रैवल जैसे विषयों पर मजबूत पकड़ रखते हैं। प्रभात की स्टोरीज़ सिर्फ जानकारी नहीं देतीं, बल्कि यात्रा के माहौल, भाव और अनुभव को भी महसूस कराती हैं। अब तक 7,000 से अधिक कंटेंट लिख चुके प्रभात अपनी सहज भाषा, प्रामाणिक जानकारी और अनुभव-आधारित दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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