Mirza Ghalib Shayari: मिर्जा असदुल्लाह बेग खां उर्फ गालिब उर्दू और फारसी के महान शायर थे। उन्हें अगर हिंदुस्तान का सबसे बड़ा शायर कहा जाए तो कहीं से गलत ना होगा। आगरा में जन्मे गालिब का बचपन तुर्की-मंगोल परिवार में बीता। 13 साल की उम्र में शादी हुई और दिल्ली बस गए। गालिब की शायरी में दर्शन, प्रेम, जीवन की नश्वरता और व्यंग्य भरपूर है। मिर्जा गालिब सूफी विचारों से खूब प्रभावित थे, लेकिन अंधविश्वासों पर तंज कसने में कभी पीछे नहीं रहते थे। उनके बहुत से ऐसे शेर हैं जो लोगों की जुबान पर आज तक चढ़े हुए हैं। ऐसा ही एक शेर है जो नए साल के मौके पर खूब साझा किया जा रहा है। आज की शायरी में पढ़ते हैं गालिब का वही शेर:
"देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़
इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है"
मिर्ज़ा गालिब का यह शेर व्यंग्य, दर्शन और कटाक्ष का कॉकटेल है। इस शेर का सतही अर्थ जितना सरल दिखता है, उतना ही गहरा इसका भाव है। इस शेर में उश्शाक़ का मतलब आशिक, बुत यानी प्रतिमा या मूर्ति और फ़ैज मतलब लाभ, कृपा या फल है। दूसरे मिसरे में बरहमन का मतलब ब्राह्मण से है, जो परंपरागत रूप से पंचांग, ज्योतिष और शुभ-अशुभ समय बताने वाला माना जाता है।
गालिब अपने इस शेर में कहते हैं कि देखते हैं आशिकों को अपने बुतों (महबूबों) से क्या हासिल होता है, क्योंकि एक ब्राह्मण ने भविष्यवाणी की है कि यह साल अच्छा है। यहां गालिब दरअसल प्रेम, आस्था और भविष्यवाणियों पर तंज कस रहे हैं।
इस शेर में गालिब प्रेमियों की उस उम्मीद को सामने रखते हैं, जो हर नए साल, हर नए वक्त से यह आशा करते हैं कि अब शायद हालात बदलें, अब शायद इश्क रंग लाए। ब्राह्मण की भविष्यवाणी प्रतीक है उन सामाजिक, धार्मिक या ज्योतिषीय दावों की, जिनके सहारे इंसान अपने दिल को तसल्ली देता है।
गालिब का व्यंग्य यहां यह है कि आशिकों का नसीब किसी पंचांग या भविष्यवाणी से नहीं बदलता। इश्क में सुख-दुख का मिलना किसी अच्छे साल पर निर्भर नहीं करता। फिर भी इंसान उम्मीद करना नहीं छोड़ता। यही मानवीय कमजोरी भी है और खूबसूरती भी।
यह शेर इश्क की मासूम उम्मीदों, इंसानी दिल की भोली आस्थाओं और समाज में फैली भविष्यवाणियों पर एक तीखा लेकिन मुस्कुराता हुआ तंज है। गालिब हमें यह एहसास दिलाते हैं कि चाहे साल अच्छा हो या बुरा, आशिक की हालत वही रहती है। उम्मीद और इंतजार के बीच झूलती हुई।
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