मिर्ज़ा ग़ालिब सिर्फ एक शायर नहीं थे, वे उर्दू जुबान की आबरू और शायरी की मांग का सिंदूर थे। उनकी शायरी इश्क़ की टीस, वक़्त की बेरुख़ी और ज़िंदगी की जटिलताओं का आईना है। ग़ालिब ने शब्दों को महज़ कविता नहीं, भावना की धड़कन बना दिया था। उनकी कलम से निकली पंक्तियां आज भी दिल के सबसे छुपे हुए जज़्बात को छू जाती हैं।
अपना शेर - हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले.., कहते हुए उन्होंने चाहत की चुभन को शायराना अंदाज़ में अमर कर दिया। ग़ालिब की ज़िंदगी खुद एक कविता थी। कर्ज़, तन्हाई, शोहरत और दर्द से बुनी हुई। लेकिन उनका अंदाज़-ए-बयां इतना ऊंचा था कि दर्द भी नज़्म बन गया और तन्हाई भी साथी। दिल्ली की गलियों से उठकर, वे दुनिया की अदबी फिज़ाओं में गूंजते रहे। उनके शब्द आज भी महफिलों में गूंजते हैं, दीवारों पर लिखे जाते हैं और टूटे दिलों को जोड़ते हैं।
यह कहना कहीं से गलत नहीं होगा कि ग़ालिब के बिना उर्दू अधूरी है और शायद इश्क़ भी। उर्दू अदब की दुनिया में गालिब की रुखसती ने ऐसा सूनापन पैदा कर दिया जिसकी भरपाई कभी ना हो सकी। गालिब की मौत 15 फरवरी 1869 में हुई थी। हालांकि उनके निधन की खबर 2 दिन बाद अखबारों में छपी और लोग इस मनहूस खबर से रूबरू हो सके।
ग़ालिब की मौत की ख़बर 17 फरवरी 1869 को सबसे पहले दिल्ली के उर्दू अख़बार अकमल-उल-अख़बार ने छापी थी। अख़बार ने ग़ालिब की मौत की ख़बर को 'ग़ालिब की वफ़ात' शीर्षक से बड़ी अहमियत देकर छापा था। वह पूरी खबर कुछ इस तरह थी:
ग़ालिब की वफ़ात
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलय्ही राजि'ऊन
फ़ुग़ां अज़ ज़माना-ए-ग़द्दारे, आह अज़ रोज़गार-ए-नाहंजारे!
"हर रोज़ नया रंग दिखाता है, हर दम दाम-ए-ग़म में फंसाता है। इस मुहीत-ए-आफ़त की मौज बला-ख़ेज़ है। इस वादी-ए-हौलनाक की हवा फ़ितना-अंगेज़ है, इस का आब सराब, इस की राहत जुज़्व-ए-जराहत, इस की राफ़त सर्माया-ए-सदाक़त। इस की शकर ज़हर-आलूद, इस की उम्मीद आरज़ू-ए-फ़र्सूदा. हर रोज़ मह्ल-ए-हयात को सरसर-ए-ममात से गिराता है। हर दम महफ़िल-ए-सुरूर से सदा-ए-मातम उठाता है। फूल इधर खिला, उधर गिर पड़ा. लाला लिबास-ए-रंगीन में यही दाग़ दिल पर रखता है।
ग़ुंचा ख़ून-ए-जिगर से परवरिश पाता है। बुलबुल नौहा-गर-ए-चमन है और मुर्ग़-ए-सहर-ख़ां असीर-ए-महन!क्या अजब गर आसमां दर-पए-आज़ार है। भला इस से क्या तवक़्क़ो'-ए-आसूदगी जिस का ख़ुद गर्दिश पर मदार है।
देखो बैठे-बिठाए क्या आफ़त उठाई है, किस मुंतख़िब-ए-रोज़गार की जुदाई दिखाई है। नख़्ल-ए-बरोमंद से म'आनी को बाद-ए-ख़िज़ां से गिराया, मेह्र-ए-सिपेह्र-ए-सुख़न-दानी को ख़ाक में मिलाया। जो ख़ुसरो के बाद मुल्क-ए-सुख़न का ख़ुसरो-ए-मालिक-रिक़ाब था, उस का नामा-ए-उम्र तै हुआ। जो मैदान-ए-सुख़न-वरी का शहसवार था, उस का रख़्श-ए-ज़िंदगी पै हुआ।

मिर्जा गालिब
उन हज़रत की किन किन ख़ूबियों का ज़िक्र किया जाए। दरया कूज़े में क्यूंकर समाए। हुस्न-ए-ख़ुल्क़ में अख़्लाक़ की किताब। 'अमीम-उल-अश्फ़ाक़ी में लाजवाब। ख़ूबी-ए-तहरीर में बेनज़ीर। साफ़ी ज़मीर, जादू तक़रीर। फ़ारसी ज़बान में लासानी, उर्दू-ए-मुअल्ला के बानी।
अफ़सोस जिस का शहबाज़-ए-ख़याल ताइर-ए-सिद्रा-शिकार हो, वो पंजा-ए-गुर्ग-ए-अजल में गिरिफ़्तार हो। इस ग़म से सब की हालत तबाह है। रोज़ यही इस मुसीबत में सियाह है। अब तौज़ीह-ए-इज्माल ओ तफ़्सील-ए-मक़ाल है। वाज़ेह हो के जनाब-ए-मरहूम दो तीन महीने से साहिब-फ़िराश रहे। ज़ो'फ़ ओ नक़ाहत के सदमे सहे।
आठ दिन इंतिक़ाल से पहले खाना पीना तर्क फ़रमाया। इस दुनिया-ए-फ़ानी से बिलकुल दिल उठाया। ता आंके 15 फ़रवरी 1869 रोज़-ए-दोशंबा दोपहर ढले इस ख़ुर्शीद-ए-औज-ए-फ़ज़्ल-ओ-कमाल का ज़वाल हुआ।"
