किताब कैफे (Kitaab Cafe): हिंदी साहित्य की बात हो और प्रेमचंद के 'गोदान' का जिक्र न आए, ऐसा शायद ही कभी होता है। प्रेमचंद की यह अमर उपन्यास पहली बार 1936 में प्रकाशित हुआ। आपको शुरू में लगेगा कि ये किसी एक किसान की कहानी है। लेकिन जैसे-जैसे इस किताब के पन्ने पलटते जाएंगे, आपको समझ में आएगा कि ये तो हमारे समाज का ऐसा आईना है, जिसमें गरीबी, शोषण, जाति, रिश्ते, स्त्री की स्थिति और इंसानी संघर्ष की पूरी तस्वीर दिखाई देती है। लगभग नौ दशक बाद भी गोदान उतना ही प्रासंगिक लगता है, जितना अपने समय में था। यही वजह है कि हर व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक बार इस उपन्यास को जरूर पढ़ना चाहिए।
समाज का दस्तावेज है गोदान
गोदान का नायक होरी एक साधारण किसान है। उसकी सबसे बड़ी इच्छा एक गाय खरीदने की है। यह छोटी-सी इच्छा भी उसके लिए संघर्ष, कर्ज और दुखों का कारण बन जाती है। होरी के रूप में प्रेमचंद ने उस ग्रामीण भारत को गढ़ा है, जो गरीबी, सामाजिक संरचना, असमानता और शोषण के बीच जी रहा था।
अगर आपको असली भारत को समझना है तो यहां के गांवों को समझना होगा। और अगर भारत के गांवों को समझना है तो गोदान से बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता।
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इंसानी रिश्तों को समझ है गोदान
गोदान की सबसे बड़ी ताकत इसके पात्र हैं। प्रेमचंद ने होरी, धनिया, गोबर और झुनिया जैसे चरित्रों को यूं संवारा है कि ये किताब के पन्नों से निकलकर हमारे आसपास के लोग लगने लगते हैं। धनिया का पात्र को गजब ही है। धनिया मजबूत है, व्यावहारिक है और हर मुश्किल परिस्थिति में परिवार का सहारा बनकर खड़ी रहती है। मुसीबत आए तो साथ मिलकर लड़ना भी सिखाती है गोदान।
आज भी पढ़ी जानी चाहिए गोदान
गोदान पढ़ने की सबसे बड़ी वजह इसकी कालजयी प्रासंगिकता है। इस उपन्यास को पढ़ने के बाद आप समझेंगे कि समाज महज आर्थिक व्यवस्थाओं से नहीं, इंसानी संवेदनाओं, न्याय और समानता से भी बनता है।
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प्रेमचंद ने कहीं भी उपदेश देने की कोशिश नहीं की। उन्होंने पूरी ईमानदारी से वही चीज सामने रखी है जो हमारे समाज की हकीकत है। शायद यही कारण है कि गोदान हिंदी साहित्य की महान कृति होने के साथ ही हर पीढ़ी के लिए पढ़ी जाने वाली एक जरूरी दस्तावेज भी है।
