Silicon Valley of India: बेंगलुरु, भारतीय राज्य कर्नाटक की राजधानी है। यह शहर दक्षिण भारत के दक्कन पठार (Deccan Plateau) पर स्थित है और समुद्र तल से लगभग 900 मीटर (लगभग 3,000 फीट) की ऊंचाई पर बसा हुआ है। इस ऊंचाई के कारण बेंगलुरु की जलवायु पूरे वर्ष सुखद और मध्यम बनी रहती है, जो इसे भारत के अन्य महानगरों से अलग बनाती है। बेंगलुरु को अक्सर "भारत की सिलिकॉन वैली" कहा जाता है, क्योंकि यह देश का प्रमुख आईटी (सूचना प्रौद्योगिकी) केंद्र है। यहां देश-विदेश की अनेक प्रसिद्ध तकनीकी कंपनियों और स्टार्टअप्स के मुख्यालय स्थित हैं।

भारत की सिलिकॉन वैली (फोटो: iStock)
इसके साथ ही, शिक्षा, अनुसंधान, स्वास्थ्य और नवाचार के क्षेत्र में भी अग्रणी माना जाता है। इतिहास की दृष्टि से भी बेंगलुरु का विशेष महत्व है। इसकी स्थापना 16वीं शताब्दी में केम्पेगौड़ा द्वारा की गई थी, जिन्होंने शहर की आधारशिला रखी थी। समय के साथ यह एक छोटे से कस्बे से विकसित होकर आधुनिक महानगर बन गया है, जहां परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। आज बेंगलुरु न केवल तकनीकी प्रगति के लिए जाना जाता है, बल्कि इसकी हरी-भरी सड़कों, सुंदर बागों, और संस्कृतिक विविधता के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां की जीवनशैली विश्वस्तरीय होते हुए भी भारतीयता की जड़ों से जुड़ी हुई है, जो इसे देश के सबसे आकर्षक और रहने योग्य शहरों में से एक बनाती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि कब और कैसे बेंगलुरु सिलिकॉन वैली ऑफ इंडिया बना?
जमशेदजी टाटा का सपना
बेंगलुरु को आज भले ही देश की आईटी राजधानी कहा जाता है, लेकिन इससे पहले यह भारत की इलेक्ट्रॉनिक राजधानी और उससे भी पहले विज्ञान अनुसंधान का प्रमुख केंद्र बन चुका था। कहा जाता है कि लगभग 1898 में जमशेदजी टाटा ने देश में आधुनिक और प्रगतिशील शिक्षा की नींव रखने का सपना देखा। उन्होंने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए, एक विज्ञान संस्थान की स्थापना की योजना तैयार करने के लिए विभिन्न सरकारी और शैक्षणिक प्राधिकरणों से परामर्श किया और एक अनंतिम समिति (Provisional Committee) का गठन किया।

भारत की सिलिकॉन वैली (फोटो: iStock)
बाद में इस संस्थान का नाम भारतीय विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Science - IISc) रखा गया। इस परियोजना को साकार करने के लिए टाटा ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन से कई बार चर्चा की और रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन तथा नोबेल पुरस्कार विजेता सर विलियम रैमसे (Sir William Ramsay) से भी सहयोग प्राप्त किया। रैमसे ने भारत के कई हिस्सों का दौरा किया और सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद बैंगलोर (अब बेंगलुरु) को संस्थान की स्थापना के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना। उनका प्रमुख तर्क था, यहां की संतुलित और अनुकूल जलवायु, जो वैज्ञानिक शोध और शिक्षा के वातावरण के लिए आदर्श थी।
भारत की “सिलिकॉन वैली” का विकास
बैंगलोर (अब बेंगलुरु) ने धीरे-धीरे शिक्षा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति करनी शुरू की। 1970 के दशक की शुरुआत में, कर्नाटक राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम (KEONICS) के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक आर.के. बलीगा (R.K. Baliga) ने एक दूरदर्शी विचार प्रस्तुत किया, एक इलेक्ट्रॉनिक सिटी की स्थापना का। माना जाता है कि यह संकल्पना उन्हीं के मस्तिष्क की उपज थी। उनका उद्देश्य था कि बैंगलोर को भारत की “सिलिकॉन वैली” के रूप में विकसित किया जाए।

भारत की सिलिकॉन वैली (फोटो: iStock)
समय के साथ, इस शहर ने अंतरराष्ट्रीय तकनीकी प्रगति की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए। ‘डॉटकॉम बूम’ के दौर में, यहां अनेक स्थानीय और विदेशी आईटी कंपनियों की स्थापना हुई, जिससे बैंगलोर का आईटी उद्योग नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया। आज यह शहर इसरो (ISRO), विप्रो (Wipro), इन्फोसिस (Infosys) और एचएएल (HAL) जैसे प्रमुख भारतीय तकनीकी संस्थानों और कंपनियों का मुख्यालय है। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से बेंगलुरु उच्च-प्रौद्योगिकी उद्योग, विशेष रूप से सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) का केंद्र बन गया है। साथ ही, कई बहुराष्ट्रीय टेक कंपनियों ने यहां अपने कार्यालय स्थापित किए, जबकि इन्फोसिस और विप्रो जैसी अग्रणी घरेलू कंपनियों ने भी शहर को अपना मुख्यालय बनाया जिससे बेंगलुरु न सिर्फ भारत, बल्कि पूरे विश्व का एक प्रमुख टेक हब बन गया।
