हर दिन हमारे घरों में आने वाली सब्जियां, राशन की थैलियां और कटिंग बोर्ड जैसी दैनिक जरूरत की चीजें जिस पॉलिथीन से बनती हैं, वह पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है। ये प्लास्टिक सैकड़ों सालों तक सड़ता नहीं है। लेकिन अगर इसी फेंके हुए प्लास्टिक कचरे को आपकी गाड़ी के ईंधन में बदल दिया जाए, तो क्या हो। अमेरिका के ऊर्जा विभाग (US Department of Energy) की ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी (ORNL) और यूनिवर्सिटी ऑफ टेनेसी के वैज्ञानिकों ने यही कर दिखाया है। उन्होंने एक ऐसी तकनीक खोजी है, जो बेहद कम तापमान पर कचरा प्लास्टिक को हाई-क्वालिटी ईंधन में बदल देती है।
पुरानी तकनीक Vs नई तकनीक: यह खोज इतनी खास क्यों है?
अब तक प्लास्टिक को पेट्रोल या ईंधन में बदलने के लिए ‘पायरोलिसिस’ (Pyrolysis) नाम की तकनीक का इस्तेमाल होता था। पायरोलिसिस में प्लास्टिक को तोड़ने के लिए 450 से 500 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर गर्मी देनी पड़ती थी। इसके अलावा इसमें महंगे प्लैटिनम जैसे कैटालिस्ट, अलग से हाइड्रोजन गैस और कई केमिकल सॉल्वेंट्स की जरूरत होती थी। वहीं नई तकनीक में ORNL के वैज्ञानिकों ने इस काम के लिए 200 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर सफलता हासिल की है। 200°C तापमान उतना ही होता है, जितना हम अपने घर के किचन ओवन में बेकिंग के लिए इस्तेमाल करते हैं। इतना ही नहीं, नई इसमें न कोई महंगा कैटालिस्ट लगा और न ही बाहर से हाइड्रोजन देनी पड़ी।
'पिघला हुआ नमक' इस तकनीक का असली हीरो
वैज्ञानिकों ने इस पूरी प्रक्रिया में एल्युमिनियम क्लोराइड से बने पिघले हुए नमकों यानी मॉल्टेन सॉल्ट्स इस्तेमाल किया है। इसे आसान भाषा में ऐसे समझिए जैसे गरम कढ़ाई में चीनी पिघलकर चाशनी बन जाती है, वैसे ही यह नमक बहुत अधिक गर्मी में पिघला हुआ रहता है। यह पिघला हुआ नमक दो काम एक साथ करता है। पहला तो ये रिएक्शन मीडियम बनता है, यानी यह प्लास्टिक को घोलने का काम करता है और यह कैटालिस्ट का काम करता है, जो रासायनिक प्रतिक्रिया को रफ्तार देता है।
पॉलिथीन को कैसे तोड़ता है नमक?
पॉलिथीन असल में कार्बन और हाइड्रोजन परमाणुओं की एक बहुत लंबी और मजबूत Polymer Chain होती है। यह जंजीर इतनी मजबूत होती है कि इसे तोड़ना आसान नहीं होता। वैज्ञानिकों ने जब सॉफ्ट एक्स-रे और न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस जैसी तकनीकों से देखा, तो पाया कि पिघले हुए नमक में मौजूद एल्युमिनियम एटम बेहद शक्तिशाली एसिडिक साइट्स बनाते हैं।
आसान उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए प्लास्टिक की लंबी चेन एक मोटी रेलगाड़ी की तरह है। एल्युमिनियम के ये एसिडिक पॉइंट्स एक आरी का काम करते हैं, जो उस लंबी रेलगाड़ी को काटकर छोटे-छोटे डिब्बों यानी छोटे हाइड्रोकार्बन अणुओं) में बांट देते हैं। यही छोटे डिब्बे असल में पेट्रोल या डीजल के मॉलिक्यूल हैं। प्रयोगों के दौरान वैज्ञानिकों को 60% तक पेट्रोल हासिल करने में सफलता मिली। जब प्लास्टिक की जंजीरें सीधी और सरल थीं, तो पेट्रोल जैसा ईंधन बना; और जब जंजीरें उलझी हुई थीं, तो डीजल जैसा ईंधन तैयार हुआ।
वैज्ञानिकों ने कैसे पकड़ी हर हरकत?
इस बारीक केमिस्ट्री को समझने के लिए अमेरिका की दो बड़ी लेबोरेटरीज के वैज्ञानिकों ने एक साथ काम किया। ओक रिज लैब के वैज्ञानिकों ने स्पैलेशन न्यूट्रॉन सोर्स का इस्तेमाल किया। न्यूट्रॉन की खासियत यह होती है कि वे हाइड्रोजन जैसी हल्की चीजों को बहुत स्पष्ट देख सकते हैं। वैज्ञानिकों ने कार्बन आयनों पर 'ड्यूटेरियम' (हाइड्रोजन का एक आइसोटोप) का टैग लगाकर देखा कि वे कैसे बदल रहे हैं। लॉरेंस बर्कले नेशनल लैब में वैज्ञानिकों ने सॉफ्ट एक्स-रे के जरिए देखा कि एल्युमिनियम और प्लास्टिक के आपस में मिलने पर इलेक्ट्रॉन्स का ट्रांसफर कैसे हो रहा है।
कैसा होगा भविष्य
इस नई तकनीक की सबसे बड़ी ताकत यह है कि एल्युमिनियम का ये पिघला हुआ सॉल्ट बेहद सस्ता है और आसानी से मिल जाता है। लेकिन इसके सामने एक चुनौती भी है। यह नमक भी सामान्य नमक की तरह हाइग्रोस्कोपिक होता है, यानी यह हवा से नमी को खींच लेता है। नमी मिलने पर इसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है। फिलहाल वैज्ञानिक इस नमक को नमी से बचाने के लिए कार्बन-बेस्ड मटेरियल्स और हैलोजन के इस्तेमाल पर रिसर्च कर रहे हैं। अगर यह तकनीक लैब से निकलकर बड़े पैमाने पर फैक्ट्रियों तक पहुंचती है, तो दुनिया भर में बिखरे प्लास्टिक कचरे की समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी और हमें एक सस्ता, नया ईंधन मिल सकेगा।
