जब भी सार्वजनिक परिवहन की बात आती है, तो जहन में सबसे पहले सरकारी बसों का नाम ही आता है। देश के लगभग हर राज्य में राज्य परिवहन निगम (State Road Transport Corporation) की बसें शहर से लेकर गांवों तक की जीवन रेखा मानी जाती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में एक राज्य ऐसा भी है, जहां एक भी सरकारी बस नहीं चल रही है? इस राज्य में करीब दो दशक पहले ही सरकारी यात्री बस सेवा का संचालन बंद हो गया था। यह हैरान करने वाला सच है, जहां का पूरा सार्वजनिक परिवहन तंत्र पूरी तरह से निजी ऑपरेटरों के भरोसे चल रहा है। आइए जानते हैं कि वह कौन सा राज्य है, वहां सरकारी बसें क्यों और कैसे बंद हुईं, और अब वहां क्या बड़ा बदलाव होने जा रहा है।
किस राज्य में नहीं चलती हैं सरकारी बसें?
भारत का दिल कहा जाने वाला मध्य प्रदेश देश का इकलौता ऐसा राज्य है, जहां वर्तमान में सरकारी बस सेवा संचालित नहीं हो रही है। लेकिन ऐसा नहीं है कि इस राज्य में पहले कभी सरकारी बस नहीं चली। आज से करीब 20 साल पहले यहां भी सरकारी बसें सड़कों पर रफ्तार भरती थीं। लेकिन साल 2005 में मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम यानी MPSRTC को बंद करने का फैसला लिया गया। उस समय बाबूलाल गौर के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने निगम को बंद करने का निर्णय लिया था। हालांकि, इसके बंद होने की प्रक्रिया की रूपरेखा इससे पहले ही तैयार होने लगी थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, 2003 से पहले की कांग्रेस सरकार के दौरान भी निगम को बंद करने की दिशा में प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, जिसे 2005 में लागू किया गया।
जब घाटे के चलते बंद हुई थी MPSRTC
MPSRTC को बंद करने के पीछे सबसे प्रमुख वजह निगम की खराब वित्तीय स्थिति बताई गई। रिपोर्ट्स के अनुसार, निगम को लगातार भारी वित्तीय घाटे, बढ़ते कर्ज और व्यापक कुप्रबंधन के चलते साल 2005 में आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बंद होने के समय निगम को हर महीने करीब 5 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था। निगम पर कर्मचारियों के वेतन और पेंशन का भी बड़ा दबाव था। बंद होने से पहले कर्मचारियों को कई महीनों तक वेतन नहीं मिल पाने की बात भी सामने आई थी। उस समय वेतन का बकाया करीब 45 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।
11,500 कर्मचारियों पर पड़ा असर
रिपोर्ट्स के अनुसार, MPSRTC के बंद होने से करीब 11,500 कर्मचारी सीधे प्रभावित हुए थे। निगम की कमाई का बड़ा हिस्सा प्रशासन और कर्मचारियों से जुड़े खर्चों को पूरा करने में ही चला जाता था। वित्तीय संकट के बीच निगम की स्थिति लगातार कमजोर होती गई। अपने सुनहरे दौर में 2,700 से अधिक बसों का संचालन करने वाला यह निगम घाटे की वजह से सिमटकर सिर्फ 850 बसों पर आ गया था और आखिरकार इसे बंद करना पड़ा।
राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार के आरोप
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, निगम की बदहाल स्थिति के पीछे राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार को भी एक कारण बताया गया। बसों की खरीद-फरोख्त और परमिट जारी करने से जुड़े मामलों में सालों तक राजनीतिक दखल की बात सामने आई। इन कारणों से निगम के संचालन और वित्तीय स्थिति पर असर पड़ने का जिक्र किया गया।
दो दशक बाद मध्य प्रदेश में लौट रही है सरकारी बस सेवा
एक तरफ जहां देश के कुछ हिस्सों में सरकारी परिवहन व्यवस्थाएं इतिहास बन चुकी हैं, वहीं मध्य प्रदेश सरकार ने परिवहन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए दो दशक के लंबे अंतराल के बाद राज्य में सरकारी बस सेवाओं को फिर से शुरू करने का फैसला किया है। 25 सितंबर 2026 से राज्य में 'मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा' नाम से एक नई सरकारी बस सेवा की शुरुआत होने वाली है। मुख्यमंत्री मोहन यादव और केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी भोपाल के BHEL दशहरा मैदान पर आयोजित एक भव्य राज्य-स्तरीय कार्यक्रम में इसका आधिकारिक शुभारंभ करेंगे। यह सेवा पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर आधारित रहेगी।
आधुनिक सुविधाओं से लैस बेड़ा
नई ‘सुगम परिवहन सेवा’ के तहत इंटरसिटी और इंट्रासिटी दोनों तरह की बसें चलाई जाएंगी। इंटरसिटी बसें दो या उससे अधिक शहरों को जोड़ेंगी, जबकि इंट्रासिटी बसें शहरों के भीतर सार्वजनिक परिवहन को मजबूती देंगी। यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखते हुए इन बसों में जीपीएस (GPS) लाइव ट्रैकिंग और पैनिक बटन जैसी आधुनिक सुविधाएं भी दी गई हैं, ताकि आपातकालीन स्थिति में तुरंत मदद मिल सके।
पांच साल में 15 हजार बसों का लक्ष्य
राज्य सरकार ने अगले पांच सालों में इस बेड़े का विस्तार कर कुल 15,000 बसों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इसके तहत हर साल लगभग 2,500 से 3,000 नई बसें बेड़े में जोड़ने की योजना है। इससे प्रदेशभर के यात्रियों को आवागमन के बेहतर और सुरक्षित विकल्प मिल सकें। नई सेवा के लिए ड्राइवरों की ट्रेनिंग पर भी जोर दिया जा रहा है। इंदौर और छिंदवाड़ा में पहले ही इंस्टीट्यूट ऑफ ड्राइविंग ट्रेनिंग एंड रिसर्च स्थापित किए जा चुके हैं। भोपाल, बैतूल, छतरपुर, उज्जैन और ग्वालियर में पांच क्षेत्रीय केंद्र बनाए जा रहे हैं। साथ ही, जल्द ही 22 जिला-स्तरीय केंद्र भी शुरू किए जाएंगे। यहां ड्राइवरों को आधुनिक तकनीक, सुरक्षा मानकों और इलेक्ट्रिक व CNG बसों के संचालन की ट्रेनिंग दी जाएगी।