Row over SIR: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया पर पहले से सवाल उठाने वाले विपक्ष में एक नई ताकत आ गई है। यह ताकत समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद आई है जिसमें कहा गया है कि SIR के विभिन्न पहलुओं को लेकर चुनाव आयुक्तों में मतभेद थे। आयुक्तों की आपत्ति के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने फैसले पर आगे बढ़े। इस सनसनीखेज रिपोर्ट के सामने आने के बाद कांग्रेस सहित विपक्ष के हाथ एक बड़ा मुद्दा आ गया है। पूरा विपक्ष एकजुट है और सीईसी ज्ञानेश कुमार और सरकार पर हमलावर है। रिपोर्ट के खुलासे के बाद ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग की जा रही है।
CEC की कार्यशैली पर विपक्ष को संदेह
आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल तो ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार किए जाने के पक्ष में हैं। SIR के जरिए 'वोट चारी' का आरोप लगाने वाले कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को मानो एक नया 'हथियार' मिल गया है। वह अब पहले से ज्यादा आक्रामक हो गए हैं। इस रिपोर्ट के बाद विपक्ष एसआईआर पर सीईसी की भूमिका एवं उनकी कार्यशैली पर संदेह जता रहा है। कई विपक्षी दलों ने तो बंगाल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में दोबारा विधानसभा चुनाव कराने की मांग तक कर डाली है। विपक्ष को आशंका है कि एसआईआर के नाम पर बहुत सारे वैध वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में क्या है
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। इनमें एक ही दिन में चार बार दर्ज की गई आपत्तियां भी शामिल बताई गईं, और दोनों आयुक्तों का कहना था कि कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए या जारी किए गए। आपत्तियों के विषयों में नए मतदाताओं का पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाना-जोड़ना और SIR में नाम वापस जोड़ने के आदेशों के खिलाफ अपील जैसे मुद्दे बताए गए। रिपोर्ट के अनुसार फॉर्म-6 और मतदाता सूची के IT सिस्टम से जुड़े सवाल भी इनमें शामिल थे। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार समेत तीन सदस्यों वाले आयोग में दो सदस्यों का बार-बार लिखित असहमति दर्ज कराना असामान्य माना जा रहा है। विपक्ष ने इसी को अपनी पुरानी शिकायतों की पुष्टि की तरह पेश किया है।
गोवा CEO ने दिल्ली ECI को भेजा था ई-मेल
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के विभिन्न पहलुओं पर चुनाव आयुक्तों में मतभेद होने का खुलासा करने वाली अपनी सनसनीखेज रिपोर्ट के एक दिन बाद इंडियन एक्सप्रेस ने 24 सितंबर को एक और बड़ा दावा किया। अखबार का दावा है कि SIR प्रक्रिया के तहत गोवा में जब अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन होना था, उससे चार दिनों पहले 17 फरवरी को राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) ने दिल्ली स्थित ECI को ई-मेल भेजा था। बीते सात दिनों में इस तरह का यह आठवां ई-मेल था। रिपोर्ट के मुताबिक इस ई-मेल में ऐसे 97 वोटरों के नाम थे जिनकी वैधता एवं पात्रता की जांच गोवा के ही निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (EROs) ने की थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई प्रक्रिया वाली जांच में ये मतदाता वैध एवं पात्र मिले थे।
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मतदाता सूची में नहीं थे सभी 97 नाम
इस ई-मेल में कहा गया था कि मतदाता सूची से इन मतदाताओं को बाहर करने के पूर्व के फैसलों को बदला जाना है लेकिन EROs ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर के जरिए इन फैसलों को बदल नहीं पाए। वजह यह थी कि ऐसा करने की अनुमति देने वाला नियंत्रण दिल्ली के पास था। रिपोर्ट के मुताबिक गोवा की अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 21 फरवरी को हुआ और अखबार ने सभी 97 नामों की जांच की। जांच में सभी नाम 20 सितंबर तक मतदाता सूची में नहीं थे।
विपक्ष की क्या हैं दलीलें
पहली दलील यह है कि SIR प्रक्रिया आयोग की सामूहिक सहमति से नहीं, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त की मनमानी से चली। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि दो आयुक्तों की आपत्तियों को दरकिनार कर मुख्य चुनाव आयुक्त ने मनमानी की, ताकि बीजेपी को फायदा पहुंचे। उनका कहना है कि उन्होंने जून 2025 में बिहार चुनाव से ठीक पहले शुरू हुई SIR पर सबसे पहले चेताया था। दूसरी दलील मतदाता सूची की विश्वसनीयता की है। अगर सूची बनाने की प्रक्रिया पर ही आयोग के भीतर सवाल थे, तो उस सूची पर हुए चुनाव भी संदिग्ध हो जाते हैं। उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हेरफेर का आरोप लगाया। तीसरी दलील राजनीतिक दबाव की है। ठाकरे ने इसकी निष्पक्ष जांच की मांग की कि क्या चुनाव आयोग केंद्रीय गृह मंत्रालय से सीधे आदेश ले रहा था।
रिपोर्ट के बाद क्या चाहता है विपक्ष
बुधवार को मुंबई में उद्धव ठाकरे ने सीईसी ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और उन्हें जेल भेजने की मांग की। उन्होंने महाराष्ट्र, तमिलनाडु और बंगाल में चुनाव रद्द कर नए चुनाव ईवीएम की जगह पूरी तरह बैलेट पेपर से कराने की भी मांग की। ममता बनर्जी ने भी इन तीनों राज्यों के चुनाव रद्द कर बैलेट पेपर से दोबारा चुनाव की मांग की। विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट से तुरंत दखल की अपील कर रहे हैं। मांग का दायरा अलग-अलग नेताओं के हिसाब से बदलता है। तेजस्वी ने बिहार और पश्चिम बंगाल में नए सिरे से चुनाव की मांग की। एक रिपोर्ट के मुताबिक विपक्षी दलों की सूची में महाराष्ट्र, बिहार, हरियाणा, तमिलनाडु और बंगाल तक शामिल हैं। इसलिए 'तीन राज्यों' की मांग को पूरे विपक्ष की एकसमान मांग मानना ठीक नहीं होगा।
रिपोर्ट में सिर्फ एक पहलू दिखाया गया-EC
आयोग ने रिपोर्ट को पूरी तस्वीर नहीं माना है। आयोग के सूत्रों के मुताबिक सभी फैसले तीनों आयुक्तों की मंजूरी से हुए। आयोग का यह भी कहना है कि विचारों का मतभेद सामान्य बात है और रिपोर्ट में सिर्फ एक पहलू दिखाया गया। बीजेपी के संबित पात्रा ने विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाने का आरोप लगाया और कहा कि अलग-अलग राय लोकतंत्र की निशानी है। पहला सवाल कानूनी है। भारत में किसी चुनाव को रद्द करना आम तौर पर चुनाव याचिका के रास्ते या असाधारण न्यायिक हस्तक्षेप से ही संभव होता है। आयोग के भीतर असहमति अपने आप में यह साबित नहीं करती कि किसी राज्य का जनादेश अवैध था। असहमति प्रक्रिया की खामी दिखा सकती है, पर नतीजों पर उसका असर साबित करने के लिए ठोस, क्षेत्र-वार सबूत चाहिए। अब तक सामने आई रिपोर्टिंग में ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिखता, और विपक्ष के आरोप अभी आरोप ही हैं।
Rahul Gandhi
विपक्ष की बैलेट पेपर की वापसी की मांग
दूसरा सवाल राजनीतिक है। इस मांग का असली वजन शायद चुनाव रद्द होने में कम, आयोग की साख पर बहस खड़ी करने में ज्यादा है। बैलेट पेपर की वापसी की मांग ईवीएम पर पुराने विपक्षी अविश्वास को SIR की बहस से जोड़ देती है। इससे मुद्दा तकनीकी से हटकर संस्थागत भरोसे का बन जाता है। तीसरा पहलू यह है कि इस विवाद का केंद्र मतदाता सूची है, मतदान की मशीन नहीं। अगर सूची से नाम हटाने या जोड़ने की प्रक्रिया पर आयुक्तों की आपत्तियों का ब्योरा सार्वजनिक होता है, तो बहस ज्यादा तथ्य-आधारित हो सकती है। फिलहाल दोनों पक्ष उसी रिपोर्ट की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं। अब तीन बातें अहम होंगी। सुप्रीम कोर्ट में कोई याचिका पहुंचती है या नहीं, आयोग खुद आपत्तियों का रिकॉर्ड सामने रखता है या नहीं, और विपक्ष की एकजुटता मांगों के स्तर तक टिकती है या नहीं।
