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कभी 2026 को दुनिया खत्म होने की हुई थी भविष्यवाणी! जानिए 1960 के उस चर्चित 'Doomsday Equation' का पूरा सच

अवेंजर्स सीरीज की बहुप्रतीक्षित मूवी आने वाली है, Doomsday लेकिन उससे पहले ही एक 1960 के रिसर्च पेपर के मामले ने तूल पकड़ा हुआ है। जो यह दावा करता है कि नवंबर 2026 में ही दुनिया खत्म हो जाएगी। तो आइए जानते हैं Science जर्नल में छपे इस पेपर का सच।

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क्या नवंबर 2026 में आएगा प्रलय

सोशल मीडिया और वैज्ञानिक हलकों में इन दिनों एक पुरानी भविष्यवाणी को लेकर चर्चा तेज है। वर्ष 1960 में दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिकाओं में से एक 'Science' में एक पर्चा प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था "Doomsday: Friday, 13 November, A.D. 2026" यानी प्रलय: शुक्रवार, 13 नवंबर 2026। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि 13 नवंबर 2026 को दुनिया की जनसंख्या इतनी अधिक हो जाएगी कि मानव सभ्यता अंत की ओर बढ़ जाएगी। आज इस अनुमानित तारीख में एक महीने से भी कम का समय बचा है। क्या वाकई हमें घबराने की जरूरत है? आइए इस गणितीय मॉडल, इसके पीछे के विज्ञान और इसके गलत साबित होने की वजह को आसान भाषा में समझते हैं।

'डूम्सडे मॉडल' क्या था और इसे किसने बनाया था?

1960 में ऑस्ट्रियाई-अमेरिकी प्रोफेसर और साइबरनेटिक्स विशेषज्ञ हाइंज वोन फोर्स्टर (Heinz von Foerster) ने अपने दो छात्रों, पैट्रीशिया एम. मोरा और लॉरेंस डब्ल्यू. एमियट के साथ मिलकर एक शोध पत्र तैयार किया था। उन्होंने पिछले 2,000 वर्षों के जनसांख्यिकी डेटा और जटिल गणितीय समीकरणों का विश्लेषण किया। सामान्यतः माना जाता है कि आबादी एक्पोनेंशियल रेट यानी एक निश्चित गति से बढ़ती है। लेकिन वोन फोर्स्टर और उनकी टीम का तर्क था कि इंसान अन्य जीवों से अलग हैं। इंसानों में आपस में संवाद करने, नीतियां बनाने और गठबंधन बनाने की अनूठी क्षमता है। इस क्षमता के कारण जैसे-जैसे इंसानों की आबादी बढ़ी, उन्होंने संसाधनों की कमी को दूर करने के नए तरीके खोज लिए। नतीजतन, मानव आबादी केवल साधारण गति से नहीं बढ़ी, बल्कि लगातार बढ़ती हुई दर से बढ़ती चली गई।

हाइंज वोन फोर्स्टर का एक कथन उनके अनुमान के बारे में बताता है। उन्होंने कहा था, "हमारे परपोते भूख से नहीं मरेंगे, बल्कि वे जगह की कमी से एक-दूसरे से सटकर और दबकर मर जाएंगे।" इसी गणितीय गणना को जब भविष्य में प्रोजेक्ट किया गया, तो नतीजा निकला कि 13 नवंबर 2026 को मानव आबादी अनंत के करीब पहुंच जाएगी, जिससे व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी।

तीन दशकों तक बिल्कुल सटीक साबित हुआ था यह गणित

जब यह रिपोर्ट छपी, तो शुरुआत में इसे कई वैज्ञानिकों ने "हास्यास्पद" और "असंगत" करार दिया। 'Time' और 'The New York Times' जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों में इस पर बहस छिड़ गई। लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि 1960 के दशक से लेकर 1980 के दशक तक (लगभग 1993 तक) दुनिया की वास्तविक जनसंख्या वृद्धि इस 'डूम्सडे समीकरण' के अनुमानों के बिल्कुल करीब रही। यह मॉडल 1970 और 1980 के दशक में अन्य सभी जनसांख्यिकी विशेषज्ञों के अनुमानों से अधिक सटीक साबित हो रहा था। इसे जेनेटिक्स, इकोलॉजी और डेमोग्राफी की पाठ्यपुस्तकों में प्रमुखता से पढ़ाया जाने लगा। 1963 में कनाडाई संसदीय समिति और 1971 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक मामलों तक में इस शोध पत्र का उल्लेख किया गया।

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80 के दशक तक सही साबित हुआ था अनुमान (सांकेतिक चित्र: iStock)

फिर कैसे फ्लॉप हो गई यह डरावनी भविष्यवाणी?

वर्ष 1993 के आसपास, भविष्यवाणी की तारीख से ठीक आधे रास्ते पर, इस मॉडल की सटीकता बिगड़ने लगी। दुनिया की वास्तविक आबादी वैज्ञानिक अनुमानों से पीछे छूटने लगी। इसके पीछे की वजह इंसानी व्यवहार में आया वो क्रांतिकारी बदलाव था, जिसकी सिफारिश खुद वोन फोर्स्टर ने अपने लेख के अंत में की थी। उन्होंने कहा था कि अगर इंसान इस तबाही से बचना चाहते हैं, तो उन्हें वैश्विक जन्मदर को आधा करना होगा। दुनिया ने ठीक वैसा ही किया 1960 के दशक की तुलना में आज वैश्विक जन्मदर आधी से भी कम रह गई है। महिलाओं की शिक्षा, आधुनिक परिवार नियोजन और शहरीकरण के कारण दुनिया भर में प्रजनन दर (Fertility Rate) में तेजी से गिरावट आई। कई विकसित और विकासशील देशों में आबादी बढ़ने के बजाय अब स्थिर या घटने की कगार पर है।

'जादूगर' वैज्ञानिक की अनूठी ट्रिक

दिलचस्प बात यह है कि प्रोफेसर हाइंज वोन फोर्स्टर का ये पेपर इतनी चर्चा में कैसे आया। इस पेपर को एक अप्रत्याशित निष्कर्ष के साथ छापा गया था, बिलकुल वैसा ही जैसा एक जादूगर अपने शो में ट्रिक दिखाता है। मजे की बात यह है कि फोर्स्टर अपने जीवन के एक पड़ाव पर स्टेज मैजिशियन भी रह चुके थे। जादू की दुनिया में किसी भी भ्रम को पैदा करने के तीन चरण होते हैं, सेटअप यानी शुरुआत, अप्रत्याशित मोड़ और अंतिम खुलासा। वोन फोर्स्टर के पेपर में इसी 'स्टेजक्राफ्ट' का इस्तेमाल हुआ। एक बेहद गंभीर मुद्दे, अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि की ओर पूरी दुनिया का ध्यान खींचने के लिए एक सनसनीखेज शीर्षक और गणितीय अतिशयोक्ति काफी साबित हुई।

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प्रजनन दर में आई गिरावट (सांकेतिक चित्र: Canva)

क्या 13 नवंबर से डरने की जरूरत है?

बिलकुल नहीं! 13 नवंबर 2026 को दुनिया का कोई अंत नहीं होने जा रहा है और न ही लोग जगह की कमी से दबकर मरने वाले हैं। हम सब उस दिन एक आम सुबह की तरह ही सोकर उठेंगे। डूम्सडे 2026' का यह किस्सा हमें सिखाता है कि भले ही कोई वैज्ञानिक मॉडल गणितीय रूप से कितना भी ठोस क्यों न दिखे, जब इंसानी व्यवहार, नीतियां और तकनीक बदलती हैं, तो बड़े से बड़े गणितीय अनुमान फेल हो जाते हैं।

Nishant Tiwari
निशांत तिवारीauthor

निशांत तिवारी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में कॉपी एडिटर हैं। शहरों से जुड़ी खबरों, स्थानीय मुद्दों और नागरिक सरोकार को समझने की उनकी गहरी दृष्टि उन्हें इस बीट का एक भरोसेमंद और प्रभावी कंटेंट राइटर बनाती है। वे जटिल लोकल इश्यूज को सहज, स्पष्ट और असरदार अंदाज में पेश करने में दक्ष हैं और अबतक 2,000 से अधिक न्यूज रिपोर्ट लिख चुके हैं। उनकी लेखन शैली शहर की नब्ज पकड़ते हुए ऐसे कंटेंट पर केंद्रित रहती है, जो सीधे पाठकों के जीवन और उनकी रोजमर्रा की चिंताओं से जुड़ा होता है।

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