Bihar Politics: बिहार में बने नए राजनीतिक समीकरण का असर देश की राजनीति एवं आगामी चुनावों दोनों पर होने जा रहा है। चुनाव रणनीतिकार मानते हैं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जनता दल-यूनाइटेड के बीच हुई 'डील' से दोनों का फायदा होगा। चूंकि, बिहार की राजनीति जाति के इर्द-गिर्द घूमती है। इसलिए सरकार के गठन में इस समीकरण का खास ध्यान रखा गया है। विशेष तौर पर राज्य के 'लव कुश' समीकरण का। नीतीश की एनडीए में वापसी से 'लव कुश' का सामाजिक समीकरण और मजबूत हुआ। नीतीश कुमार जहां कुर्मी समुदाय से आते हैं वहीं, उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी कोईरी समुदाय से आते हैं। कुर्मी और कोइरी समुदाय के समीकरण को बिहार की राजनीति में 'लव कुश' नाम दिया जाता है।
कुर्मी-कोइरी आबादी करीब 8 फीसदी
बिहार में जातिगत जनगणना पर जो सर्वे रिपोर्ट आई है तो उसके मुताबिक राज्य में कुर्मी समुदाय की आबादी 2.87 फीसदी और कोइरी समाज की आबादी 4.21 प्रतिशत है। दोनों को मिला दें तो यह आंकड़ा 8 फीसदी से ज्यादा हो जाता है। यही नहीं, राज्य में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) की आबादी 36.01 प्रतिशत है। इस समुदाय पर नीतीश की अच्छी पकड़ और प्रभाव है। चुनाव में इस समुदाय का बड़ा हिस्सा नीतीश के साथ रहा है। अब जेडीयू और भाजपा के नजदीक आने से ईबीसी वोटों पर दोनों पार्टियां मजबूत हुई हैं।
भूमिहार समाज से हैं विजय सिन्हा
नए कैबिनेट में भी जातिगत समीककण का पूरा ध्यान रखा गया है। दो डिप्टी सीएम सहित 9 मंत्रियों का शपथ ग्रहण भी यही बताता है। मंत्रियों में दो कुर्मी, दो भूमिहार, एक राजपूत, एक यादव, एक अतिपिछड़ा एवं एक महादलित वर्ग से है। दूसरे डिप्टी सीएम विजय सिन्हा भूमिहार समाज से हैं। राज्य में भूमिहार की आबादी 2.86, ब्राह्मण 3.65, राजपूत 3.45 फीसदी है। ये अगड़ी जातियां भाजपा का परंपरागत वोट बैंक हैं।
जीत में निर्णायक है जद-यू का 21.81 फीसदी वोट
पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा, जदयू, लोजपा, रालोस के वोट प्रतिशत को जोड़ दें तो यह प्रतिशत 56.91 हो जाता है। इसी वोट बैंक के साथ एनडीए ने बिहार की 40 सीटों में से 39 सीटों पर जीत दर्ज की। इस प्रदर्शन को दोहराने के लिए एनडीए को इस वोट बैंक पर अपनी दावेदारी बरकरार रखनी होगी। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 23.58 फीसदी, जद-यू को 21.81 फीसदी, लोजपा को 7.86 प्रतिशत और राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी को 3.66 फीसदी वोट मिले थे। कांग्रेस और राजद के वोट प्रतिशत की अगर बात करें तो पिछले लोकसभा चुनाव में राजद को 15.4 प्रतिशत और कांग्रेस को 7.7 फीसदी वोट मिले। नीतीश अगर भाजपा के साथ अगर नहीं आते तो जद-यू, राजद, कांग्रेस और महागठबंधन के अन्य दलों का वोट प्रतिशत 50 फीसदी तक पहुंच जाता। ऐसे में भाजपा का मिशन 2024 को बिहार में झटका लग सकता था।
