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'मस्जिद को मंदिर में नहीं बदला जा सकता'...संभल मामले में SC में मुस्लिम पक्ष की दलील; कहा-सर्वें में जल्दबाजी क्यों?

उत्तर प्रदेश के संभल स्थित जामा मस्जिद सर्वे मामले में सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की दलीलें पूरी हुईं। वकील हुजेफा अहमदी ने धार्मिक पहचान बदलने पर रोक और सर्वे प्रक्रिया पर सवाल उठाए। अब अगली सुनवाई में हिंदू पक्ष अपनी दलीलें रखेगा।

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Supreme Court

संभल : शाही जामा मस्जिद के सर्वे के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष ने लंबी दलीलें रखीं। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने मस्जिद कमेटी की ओर से वरिष्ठ वकील हुजेफा अहमदी ने दलील दी कि किसी धार्मिक स्थल, खासकर संरक्षित प्राचीन स्मारक, की धार्मिक पहचान को बदला नहीं जा सकता। उन्होंने निचली अदालत के उस आदेश की वैधता पर सवाल उठाया, जिसमें मस्जिद का सर्वे कराने के लिए कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया गया था।

मामला उत्तर प्रदेश के संभल की शाही जामा मस्जिद से जुड़ा है। निचली अदालत ने मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया था, जिसे मस्जिद कमेटी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल दिसंबर में सर्वे के आदेश पर रोक लगा दी थी। मंगलवार को मुस्लिम पक्ष की दलीलें पूरी हो गईं। अब अगली सुनवाई में हिंदू पक्ष अपनी दलीलें रखेगा।

‘मस्जिद को मंदिर में नहीं बदला जा सकता’

वरिष्ठ वकील हुजेफा अहमदी ने कहा कि पूजा स्थल की धार्मिक पहचान को बदलने की अनुमति कानून नहीं देता। उन्होंने पूजा स्थल कानून, 1991 और प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व स्थल तथा अवशेष कानून, 1958 के प्रावधानों का हवाला दिया। अहमदी ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इन दोनों कानूनों की सही व्याख्या नहीं की। उनके मुताबिक पूजा स्थल कानून की धारा 4(3) को भी गलत तरीके से लागू किया गया।

उन्होंने दलील दी कि अगर कोई संरक्षित स्मारक मंदिर है तो उसे चर्च नहीं बनाया जा सकता और अगर वह मस्जिद है तो उसे मंदिर में नहीं बदला जा सकता। यानी किसी स्मारक की धार्मिक पहचान भी उसकी सुरक्षा और संरक्षण का हिस्सा है।

‘सिर्फ स्मारक बचाना नहीं, उसकी धार्मिक पहचान भी बचाना जरूरी’

अहमदी ने 1958 के कानून का हवाला देते हुए कहा कि किसी प्राचीन स्मारक का संरक्षण केवल उसकी इमारत को बचाने तक सीमित नहीं है। अगर उस स्मारक का धार्मिक स्वरूप है तो उसे भी सुरक्षित रखना होगा। उन्होंने कहा कि दूसरे पक्ष ने कानून की धारा 18 का सहारा लिया, जो संरक्षित स्मारक तक लोगों की पहुंच से जुड़ी है। लेकिन धारा 16 को नजरअंदाज किया गया, जो स्मारक को प्रदूषण और अपवित्र किए जाने से बचाने की बात करती है।

अहमदी का कहना था कि किसी संरक्षित धार्मिक स्मारक में ऐसी धार्मिक गतिविधि की इजाजत नहीं दी जा सकती, जो उसके मौजूदा धार्मिक चरित्र के खिलाफ हो।

‘मुतवल्ली सिर्फ देखरेख करता है, मालिकाना हक ऊपर वाले का’

मस्जिद से जुड़े समझौतों की हाई कोर्ट की व्याख्या पर भी अहमदी ने सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि मुतवल्ली का काम सिर्फ संपत्ति की देखरेख करना होता है। उनके मुताबिक मस्जिद की संपत्ति का मालिकाना हक इंसान का नहीं, बल्कि अल्लाह का माना जाता है। मुस्लिम पक्ष ने मस्जिद के सर्वे के लिए स्थानीय आयुक्त नियुक्त करने के निचली अदालत के आदेश पर भी गंभीर सवाल उठाए।

सरल भाषा में समझें तो कोर्ट कमिश्नर वह व्यक्ति होता है जिसे अदालत किसी जगह की स्थिति की जांच और रिपोर्ट देने के लिए नियुक्त करती है। यहां विवाद यह है कि क्या अदालत ने इस तरह का सर्वे कराने से पहले जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया था।

अहमदी ने कहा कि निचली अदालत ने सीपीसी के आदेश 26 नियम 9 की जरूरी शर्तों का पालन नहीं किया। उनके मुताबिक सर्वे, फोटो और वीडियो बनाने की मांग वाली अर्जी मस्जिद कमेटी को पहले नोटिस दिए बिना यानी एकतरफा तरीके से लगाई गई थी।

‘जब मस्जिद आजादी के बाद से लगातार इस्तेमाल में है तो अचानक सर्वे क्यों’

अहमदी ने कहा कि मस्जिद आजादी के बाद से लगातार इस्तेमाल में है। इसके बावजूद सर्वे का आदेश देने से पहले मस्जिद कमेटी को सुनवाई का मौका नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि निचली अदालत ने यह भी नहीं बताया कि मौके पर जांच की जरूरत आखिर क्यों पड़ी। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि कोर्ट कमिश्नर को वास्तव में किन बिंदुओं की जांच करनी थी।

‘आयुक्त का काम अदालत की मदद करना, सबूत जुटाना नहीं’

अहमदी ने कहा कि अदालत द्वारा नियुक्त आयुक्त का काम अदालत की सहायता करना है, किसी पक्ष के लिए सबूत जुटाना नहीं। उन्होंने दलील दी कि हाई कोर्ट ने जिस तरह सर्वे के जरिए सबूत जुटाने की अनुमति दी, वह कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। अहमदी ने यह भी कहा कि मामला बेहद संवेदनशील है। ऐसे में मस्जिद कमेटी को सुने बिना सर्वे का आदेश देना उचित नहीं था।

सर्वे के बाद हुई हिंसा का भी जिक्र

मस्जिद कमेटी के वकील ने सर्वे के दौरान हुई हिंसा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आयुक्त के मस्जिद परिसर में जाने के बाद हिंसा हुई, जिसमें छह लोगों की जान चली गई। उनका तर्क था कि इतने संवेदनशील विवाद में अदालत को प्रक्रिया अपनाते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए थी। अहमदी ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी कहा कि इस मामले को ऐसे ही दूसरे लंबित मामलों के साथ जोड़कर सुना जाए। उन्होंने 1991 के पूजा स्थल कानून से जुड़े मामलों का भी हवाला दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने 12 दिसंबर के अपने आदेश में ऐसे मामलों में आगे की कार्यवाही को लेकर निर्देश दिए थे। मुस्लिम पक्ष का कहना था कि इन सभी मामलों में समान कानूनी सवाल उठ रहे हैं, इसलिए अलग-अलग आदेशों से विरोधाभासी स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- समाज में सहनशीलता जरूरी

सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने टिप्पणी की कि समाज को सहनशीलता दिखानी चाहिए। इसके साथ ही मंगलवार को मुस्लिम पक्ष की दलीलें पूरी हो गईं। अब अगली तारीख पर हिंदू पक्ष अपनी दलीलें शुरू करेगा।

पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने जताई थी चिंता

मई में सुप्रीम कोर्ट ने संभल जामा मस्जिद मामले में एक ही हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ मस्जिद कमेटी की ओर से अलग-अलग वकीलों के जरिए दो विशेष अनुमति याचिकाएं दाखिल किए जाने पर नाराजगी जताई थी। विशेष अनुमति याचिका यानी विशेष अनुमति याचिका वह रास्ता है, जिसके जरिए कोई पक्ष हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से मामला सुनने की अनुमति मांगता है। जस्टिस नरसिम्हा ने तब कहा था कि एक ही आदेश के खिलाफ दो अलग-अलग वकीलों के जरिए याचिका दाखिल होने की स्थिति पहली बार देखने को मिल रही है। कोर्ट ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया था और पक्षों से अपने आपसी विवादों को सुलझाने की दिशा में काम करने को कहा था।

अगस्त 2025 में भी उठा था पूजा स्थल कानून का सवाल

22 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि क्या इस मामले को पूजा स्थल कानून, 1991 की वैधता से जुड़ी लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ा जाना चाहिए। कोर्ट ने उस समय यथास्थिति बनाए रखने का आदेश बढ़ाया था। यथास्थिति का मतलब है कि जिस स्थिति में मामला उस समय था, उसे बिना अदालत की अनुमति बदला न जाए। कोर्ट ने कहा था कि वह पहले के आदेश को देखेगा ताकि अलग-अलग मामलों में एक-दूसरे से टकराने वाले आदेश जारी न हों।

मस्जिद और कुएं को लेकर भी उठा था विवाद

फरवरी 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि सम्भल स्थित शाही जामा मस्जिद सार्वजनिक जमीन पर बनी है। सरकार ने यह भी कहा था कि मस्जिद के ठीक बाहर मौजूद ‘धरणी वराह कूप’ भी सार्वजनिक जमीन पर है। सरकार के मुताबिक मस्जिद प्रबंधन कमेटी ने इस कुएं को दोबारा इस्तेमाल में लाने का विरोध किया था। जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के प्रवेश द्वार के पास स्थित इस कुएं को लेकर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।

कैसे शुरू हुआ था पूरा विवाद?

शाही जामा मस्जिद कमेटी की मूल याचिका सुप्रीम कोर्ट में 2024 में पहुंची थी। निचली अदालत ने 19 नवंबर 2024 को 16वीं सदी की इस मस्जिद का सर्वे कराने का आदेश दिया था। सर्वे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के जरिए कराया जाना था। मस्जिद कमेटी ने इस आदेश पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने मस्जिद कमेटी को पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट जाने को कहा था।

इसके बाद हाई कोर्ट के आदेश को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवालों में यह शामिल है कि धार्मिक चरित्र वाले संरक्षित स्मारक पर 1991 के पूजा स्थल कानून और 1958 के प्राचीन स्मारक कानून के प्रावधान कैसे लागू होंगे और किसी धार्मिक स्थल के सर्वे के लिए स्थानीय आयुक्त नियुक्त करने की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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