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कौन हैं 'तुलसी' और 'सुकरी', कर्नाटक में चुनाव प्रचार के दौरान जिनके PM Modi ने छुए पैर

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated May 3, 2023, 05:41 PM IST

Tulsi Gowda and Sukri Bommagowda: 72 वर्षीय आदिवासी महिला तुलसी गौड़ा को बीते साल पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 12 साल की छोटी सी उम्र से पौधरोपण कर रहीं तुलसी गौड़ा पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों के बारे में विस्तृत ज्ञान रखती हैं। यही कारण है कि उन्हें इनसाइक्लोपीडिया ऑफ फॉरेस्ट कहा जाता है। वहीं, सुकरी बोम्मगौड़ा को 'हलक्की की बुलबुल' के नाम से पुकारा जाता है।

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पीएम मोदी ने तुलसी गौड़ा और सुकरी बोम्मगौड़ा के छुए पैर (स्क्रीन ग्रैब)

Photo : ANI

Tulsi Gowda and Sukri Bommagowda: कर्नाटक विधानसभा चुनाव के प्रचार में जुटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे की एक बहुत ही प्यारी तस्वीर सामने आई है। पीएम मोदी इस तस्वीर में दो बुजुर्ग महिलाओं के पैर छूते दिखाई दे रहे हैं। इसका वीडियो भी न्यूज एजेंसी एएनआई ने जारी किया है। इस वीडियो में दोनों महिलाएं पीएम मोदी से स्नेह जताते हुए और उन्हें आशीर्वाद देते हुए दिखाई दे रही हैं।

यह वीडियो सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रहा है। ऐसे में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि आखिर ये दोनों महिलाएं कौन हैं, जिनके पीएम मोदी पैर छू रहे हैं और आशीर्वाद ले रहे हैं। दरअसल, ये दोनों महिलाएं कोई और नहीं कर्नाटक की पद्म पुरस्कार विजेता तुलसी गौड़ा और सुकरी बोम्मागौड़ा हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में...

Tulsi Gowda and Sukri Bommagowda

Tulsi Gowda and Sukri Bommagowda

'जंगल का विश्वकोष' तुलसी गौड़ा

कर्नाटक की रहने वाली 72 वर्षीय आदिवासी महिला तुलसी गौड़ा को बीते साल पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनके बारे में कहा जाता है कि वह जंगल से जुड़ी तमाम छोटी से बड़ी जानकारियां रखती हैं और हजारों पौधे लगा चुकी हैं। विशेष रूप से हलक्की जन-जाति से ताल्लुक रने वाली तुलसी गौड़ा का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था, इस कारण वह पढ़ाई न कर सकीं। हालांकि, 12 साल की छोटी सी उम्र से पौधरोपण कर रहीं तुलसी गौड़ा पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों के बारे में विस्तृत ज्ञान रखती हैं। यही कारण है कि उन्हें इनसाइक्लोपीडिया ऑफ फॉरेस्ट कहा जाता है।

'हलक्की की बुलबुल' सुकरी बोम्मगौड़ा

सुकरी बोम्मगौड़ा कर्नाटक के अंकोला से आती हैं। वह परंपरागत जनजातीय संगीत की विरासत को लंबे समय से संभाल रही हैं, जिस कारण उन्हें

'हलक्की की बुलबुल' के नाम से पुकारा जाता है। उन्हें भी पिछले साल पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया था। वह लभगग पांच दशकों से जनजातीय संस्कृति की आवाज बनी हुई हैं और 1000 से अधिक पारंपरिक हलक्की गीतों को गाया है।

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प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तव author

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रक... और देखें

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