पिछले कुछ दिनों से महाराष्ट्र, दिल्ली-एनसीआर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य भारत और पूर्वोत्तर सहित देश के कई हिस्सों में लगातार भारी बारिश हो रही है। शुरुआती देरी के बाद मानसून ने लगभग पूरे देश को सराबोर किया है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अल-नीनो (El Niño) का असर खत्म हो गया है? अगर मौसम वैज्ञानिकों से यह प्रश्न पूछेंगे तो उनका जवाब है - नहीं। फिलहाल हो रही भारी बारिश का मतलब यह नहीं कि एल नीनो का प्रबाव खत्म हो गया है। बल्कि इसके प्रभाव आने वाले महीनों में और ज्यादा स्पष्ट तौर पर दिश सकते हैं।
भारत मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, जुलाई के पहले हफ्ते में सक्रिय मानसूनी सिस्टम, बंगाल की खाड़ी से बने निम्न दबाव क्षेत्र, मानसूनी ट्रफ और उत्तर भारत में अनुकूल परिस्थितियों के कारण कई राज्यों में भारी बारिश हो रही है। लेकिन इसके बावजूद विभाग का मौसमी पूर्वानुमान अब भी जुलाई में 'सामान्य से कम बारिश' का संकेत दे रहा है।
भारी बारिश का मतलब अल-नीनो खत्म होना नहीं
मौसम के जानकार बताते हैं कि एल नीनो पूरे मानसून में हर रोज या हर इलाके में एक समान प्रभाव नहीं डालता। यह मुख्य रूप से पूरे सीजन की औसत बारिश को प्रभावित करता है। बल्कि स्थानीय स्तर पर बनने वाले लो-प्रेशर सिस्टम, पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance), मैडन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) और मानसूनी ट्रफ कुछ दिनों के लिए अत्यधिक बारिश करा सकते हैं। यही वजह है कि एक तरफ तो देश के कई हिस्सों में बाढ़ जैसे हालात बने हुए हैं, वहीं दूसरी ओर IMD के अनुसार पूरे सीजन के आंकड़े सामान्य से नीचे हैं और आगे भी नीचे ही रह सकते हैं।
NOAA ने क्यों बढ़ाई चिंता?
अमेरिका की NOAA (National Oceanic and Atmospheric Administration) ने अपने ताजा आकलन में कहा है कि इस साल का अल-नीनो तेजी से मजबूत हो रहा है। इसके 'Very Strong' श्रेणी में पहुंचने की संभावना 81 फीसद है, यानी अल-नीनो का असली प्रभाव अभी दिखना बाकी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह 1997-98 के ऐतिहासिक सुपर एल नीनो की बराबरी कर सकता है। हालांकि, इसके सबसे बड़े और बुरे प्रभाव उत्तरी गोलार्ध के बसंत और सर्दियों के मौसम में देखने को मिलेंगे।
भारत के किन इलाकों पर अल-नीनो का सबसे ज्यादा असर रहेगा?
IMD के साथ ही अंतरराष्ट्रीय मॉडल भी संकेत दे रहे हैं कि मानसून के दूसरे हिस्से यानी जुलाई के मध्य से अगस्त तक पश्चिम और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में बारिश का दौर कमजोर पड़ सकता है। इस कारण बारिश कम होगी और प्रभावित इलाकों में सूखे जैसे हालात बन सकते हैं। अल-नीनो से संभावित प्रभावित क्षेत्रों की लिस्ट यहां है -
- महाराष्ट्र (खासतौर पर विदर्भ और मराठवाड़ा)
- आंतरिक कर्नाटक
- तेलंगाना
- आंध्र प्रदेश
- केरल
- तमिलनाडु के कुछ हिस्से
इन संभावित प्रभावित क्षेत्रों में लंबे 'मॉनसून ब्रेक', बारिश की कमी और कृषि पर असर की आशंका जताई गई है। जबकि उत्तर-पश्चिम, पूर्वोत्तर और पूर्व-मध्य भारत में कई दौर की भारी बारिश जारी रह सकती है।
कृषि और किसानों पर क्या असर पड़ेगा?
जानकारों का कहना है कि अगर जुलाई के दूसरे पखवाड़े में बारिश का दौर कमजोर पड़ता है तो खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। हाल में हुई मानसूनी बारिश से कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन लंबे सूखे अंतराल से सोयाबीन, कपास, दालें और मक्का जैसी फसलें बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं। इससे किसानों की मेहनत पर पानी फिर सकता है। यही कारण है कि कृषि वैज्ञानिक, किसानों को कम अवधि वाली और कम पानी में तैयार होने वाली फसलें लगाने की सलाह दे रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने किसानों को 60 से 90 दिनों में पकने वाली छोटी अवधि की फसलें उगाने की सलाह दी है। उदाहरण के लिए, सामान्य मूंग की जगह 'विराट' या 'सम्राट' वैरायटी का चुनाव कर सकते हैं, जो 60 दिन में पक जाती है। इसके अलावा बाजरा की 'HHB 67' वैरायटी चुन सकते हैं, जो कम पानी में भी बंपर पैदावार देती है।
क्या जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा है जोखिम?
जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि आज का अल-नीनो पहले जैसा नहीं है। समुद्र पहले से ही अधिक गर्म हैं और वैश्विक तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अल-नीनो और जलवायु परिवर्तन का संयुक्त प्रभाव मौसम को और भी ज्यादा अस्थिर बना सकता है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि पूरे सीजन में औसत बारिश कम रहे, लेकिन जब भी बारिश हो तो वह बहुत तेज और कम समय में रिकॉर्ड स्तर की हो। हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि अल-नीनो वाले वर्षों में भारत के कई हिस्सों में अत्यधिक दैनिक वर्षा की घटनाएं बढ़ सकती हैं, भले ही कुल मौसमी वर्षा कम हो।
अल-नीनो और भविष्य को लेकर संभावना
IMD ने फिलहाल तो उत्तर भारत के कई राज्यों में अगले कुछ दिनों तक भारी बारिश का अनुमान जताया है। वहीं दूसरी ओर, विभाग का मौसमी पूर्वानुमान अब भी जुलाई में होने वाली बारिश को पिछले कुछ वर्षों से कम रहने की ओर इशारा कर रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि मौजूदा भारी बारिश को अल-नीनो के खत्म होने का संकेत नहीं माना जा सकता है। आने वाले हफ्तों में मानसून की चाल, MJO की स्थिति, बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव क्षेत्र और प्रशांत महासागर में अल-नीनो की तीव्रता मिलकर तय करेंगे कि भारत के किस हिस्से में बाढ़ का खतरा बढ़ेगा और देश के किस हिस्से में सूखे जैसे हालात बनेंगे।