One Nation One Election 2026: देश में बार-बार होने वाले चुनावों के सिलसिले को थामने और 'एक देश, एक चुनाव'के बड़े चुनावी सुधार को अमलीजामा पहनाने के लिए गठित संसद की संयुक्त समिति ने अपनी रफ्तार तेज कर दी है। समिति के अध्यक्ष और वरिष्ठ भाजपा नेता पी.पी. चौधरी ने शुक्रवार को एक बड़ा बयान देते हुए कहा कि समिति एक ऐसी प्रभावी और सर्वमान्य व्यवस्था तैयार करने पर काम कर रही है, जिससे इस ऐतिहासिक सुधार को वर्ष 2029 के आम चुनाव तक पूरे देश में पूरी तरह से लागू किया जा सके।
गोवा में आयोजित समिति की दो दिवसीय महत्वपूर्ण बैठक के इतर पत्रकारों से बात करते हुए राजस्थान के पाली से सांसद पी.पी. चौधरी ने दावा किया कि अब तक देश के विभिन्न राज्यों में जिन नागरिक संस्थाओं और हितधारकों (Stakeholders) से परामर्श किया गया है, उनमें से लगभग 99 प्रतिशत ने इस दूरगामी प्रस्ताव का पुरजोर समर्थन किया है।
बार-बार के चुनावों से ₹7 लाख करोड़ का आर्थिक नुकसान
संसदीय समिति के अध्यक्ष ने इस चुनावी सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए इसके आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। पी.पी. चौधरी ने बताया कि देश में अलग-अलग समय पर होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों के कारण देश को लगभग सात लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम अनुमानित आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
बार-बार चुनाव होने के कारण देश के किसी न किसी हिस्से में आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू रहती है, जिससे सरकारी मशीनरी चुनाव ड्यूटी में व्यस्त हो जाती है और आम जनता से जुड़े विकास कार्य और नीतियां लंबे समय के लिए ठप पड़ जाती हैं। एक साथ चुनाव होने से इस बर्बादी को रोका जा सकेगा।
गोवा में मुख्यमंत्री और कैबिनेट से चर्चा
संसदीय समिति ने गोवा में संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 पर व्यापक चर्चा शुरू की है। इसकी शुरुआत गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ हुई एक उच्च स्तरीय अनौपचारिक बातचीत से हुई।
बैठक के मुख्य बिंदु
चुनौतियों की पहचान: बैठक में इस बात पर विचार-विमर्श किया गया कि यदि लोकसभा और सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाते हैं, तो राज्यों के सामने किस तरह की प्रशासनिक, संवैधानिक और व्यावहारिक चुनौतियां आ सकती हैं।
संतुलन की तलाश: पी.पी. चौधरी ने कहा, "हमने मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों के साथ सार्थक चर्चा की है जो गोवा की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। हमारा मकसद एक ऐसा स्वीकार्य संतुलन और व्यवस्था बनाना है जिसे सभी राजनीतिक दल और राज्य सरकारें स्वेच्छा से स्वीकार कर सकें।"
देशव्यापी दौरा: गुजरात से लेकर दिल्ली तक टटोली नब्ज
संसदीय समिति अब तक देश के एक बड़े हिस्से का दौरा कर इस मुद्दे पर व्यापक जनमत और विशेषज्ञों की राय जुटा चुकी है। समिति ने अब तक निम्नलिखित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का दौरा किया है:
-गुजरात, महाराष्ट्र और गोवा
-कर्नाटक, पंजाब और हरियाणा
-हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली
इन दौरों के दौरान समिति ने देश के शीर्ष संवैधानिक विशेषज्ञों, नागरिक संस्थाओं (Civil Societies), शिक्षाविदों, कानूनी जानकारों और विभिन्न सामाजिक व व्यावसायिक संगठनों के प्रतिनिधियों से सीधा संवाद स्थापित किया है। समिति का कहना है कि जमीनी स्तर पर इस विचार को लेकर सकारात्मक माहौल है।
क्या 2029 से पहले भी लागू हो सकती है यह व्यवस्था?
इसे लागू करने की अंतिम समय सीमा के सवाल पर चौधरी ने संकेत दिया कि समिति के पास कई विकल्प खुले हैं। हालांकि मुख्य लक्ष्य 2029 का आम चुनाव है, लेकिन यह सुधार कुछ राज्यों में पहले भी देखने को मिल सकता है। उन्होंने कहा कि यदि कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री और वहां के राजनीतिक दल अपनी चुनावी प्रक्रिया और विधानसभा के कार्यकाल को लोकसभा के साथ मिलाने (Align) के लिए स्वेच्छा से सहमत हो जाते हैं, तो 2029 से पहले भी कुछ राज्यों को इस 'एक साथ चुनाव' की नई व्यवस्था के दायरे में लाया जा सकता है। फिलहाल समिति सभी राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति बनाने का प्रयास कर रही है।
