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सिल्क्यारा सुरंग हादसा: रैट माइनिंग पर क्यों लगाया गया था बैन? आज यही बनी मजदूरों के लिए वरदान

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Nov 28, 2023, 03:08 PM IST

Rat Mining Technique: रैट-होल माइनिंग एक ऐसी पद्धति है, जिसके जरिए खनिक कोयला निकालने का काम करते हैं, वे मैनुअल ड्रिलिंग के जरिए संकरे बिलों में उतरते हैं और खोदाई करते जाते हैं। हालांकि, मजदूरों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस पर बैन लगा दिया गया था।

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सिल्क्यारा टनल रेस्क्यू ऑपरेशन

Photo : ANI

Rat Mining Technique: उत्तरकाशी की सिल्कयारा सुरंग में फंसे 41 मजदूरों के लिए आज बड़ा दिन है। रेस्क्यू टीम उनके बेहद करीब पहुंच गई है और खबर है कि सुरंग में फंसे मजदूर कभी भी बाहर आ सकते हैं। अभी तक सामने आई जानकारी के मुताबिक, बचाव कर्मियों ने मंगलवार को उत्तराखंड की सिलक्यारा सुरंग में मलबे के अंदर 60 मीटर तक ड्रिलिंग का काम पूरा कर लिया है। उत्तराखंड सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है। सुरंग का यह वही हिस्सा है, जहां पर मजदूर फंसे हुए हैं।

बता दें, इससे पहले अमेरिकी ऑगर मशीन ने सुरंग की खुदाई की थी, लेकिन 48 मीटर तक ड्रिलिंग के बाद ऑगर मशीन का हिस्सा सुरंग में टूटकर फंस गया, जिस कारण रेस्क्यू ऑपरेशन रुक गया था। इसके बाद रेट होल माइनिंग का सहारा लिया गया और रैट माइनर्स ने 48 मीटर के आगे मैनुअल ड्रिलिंग शुरू कर दी। हालांकि, एक समय इसी रैट माइनिंग तकनीकि पर बैन लगा दिया गया था, लेकिन आज यही तकनीक मजदूरों के लिए वरदान बन गई है। आइए जानते हैं इस पर प्रतिबंध क्यों लगा था?

पहले घटना के बारे में जानिए

12 नवंबर, 2023 की सुबह 5:30 बजे सिल्क्यारा से बड़कोट के बीच बन रही सुरंग धंस गई थी। यह हादसा सुरंग में 60 मीटर की दूरी पर मलबा गिरने के कारण हुआ, जिस कारण सुंरग के अंदर काम कर रहे 41 मजदूर वहां फंस गए। घटना की सूचना मिलते ही राज्य और केंद्र सरकार की एजेंसियां सक्रिय हुई और बचाव अभियान शुरू किया गया। सबसे पहले पाइपों के जरिए मजदूरों तक ऑक्सीजन, पानी, भोजन पहुंचाना शुरू किया गया। उनके बचाव के लिए भी खुदाई शुरू की गई, लेकिन इन सब में 16 दिन बीत गए। यानी मजदूर 16 दिन से सुरंग में फंसे हुए हैं।

अब रैट होल माइनिंग के बारे में जानिए

रैट-होल माइनिंग एक ऐसी पद्धति है, जिसके जरिए खनिक कोयला निकालने का काम करते हैं, वे मैनुअल ड्रिलिंग के जरिए संकरे बिलों में उतरते हैं और खोदाई करते जाते हैं। सिल्क्यारा सुरंग में रैट माइनिंग के लिए विशेष कौशल रखने वाले रैट माइनर्स को चुना गया है। इस पद्धति में एक मजदूर मैनुअल ड्रिलिंग करता है, दूसरा मलबा इकट्ठा करता है और तीसरा मलबे को बाहर निकालने का काम करता है।

रैट माइनिंग पर क्यों लगा था प्रतिबंध

2014 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूलन (NGT) ने मजदूरों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस पर प्रतिबंध लगा दिया था। दरअसल, मजदूर बिना किसी सुरक्षा उपाय के गड्ढे में उतर आते थे और कई बार ऊपर से धंसाव होने के कारण वे उसी में फंस जाते और हादसे का शिकार हो जाते थे। कई ऐसे भी मामले दर्ज किए गए, जिसमें रैट होल माइनिंग के कारण खनन क्षेत्रों में पानी भर गया, जिससे मजदूरों की जाम जली गई।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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