UCC: समान नागरिक संहिता, बहस के केंद्र में है। लॉ कमीशन (Law Commission on common civil code)इस विषय पर ड्राफ्ट तैयार कर रहा है और 30 दिन के भीतर आम लोगों और संगठनों से सुझाव मांगा है। लेकिन इस विषय पर सियासत भी चरम पर है। अमेरिका और मिस्र से लौटने के बाद मंगलवार को मध्य प्रदेश की एक सभा में पीएम मोदी(Narendra Modi) ने कहा कि देश के लिए समान नागरिक संहिता क्यों जरूरी है। उनके इस बयान का कांग्रेस(Congress), आरजेडी, डीएमके और असदुद्दीन ओवैसी जमकर विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि भारत विविधताओं से भरा देश है इस तरह की कोशिश से देश के सामाजिक ताने बाने और सौहार्द को खत्म किया जा रहा है। चुनाव में जीत हासिल करने के लिए बीजेपी इसे हथियार के तौर इस्तेमाल कर रही है। इन सबके बीच यहां हम बताएंगे कि कांग्रेस का विरोध क्यों बेमानी है।
अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का जिक्र
सबसे पहले बात करेंगे संविधान की। संविधान में भारत के बहुभाषी, बहुधर्मी होने का जिक्र है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का जिक्र है। अनुच्छेद 44, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत के अंतर्गत है। अब चूंकि इस विषय पर कानून बनाना या ना बनाना राज्य की जिम्मेदारी है। इस विषय को न्यायालय में नहीं ले जा सकता है क्या इस बात का फायदा उठाकर कांग्रेस विरोध कर रही है। इसके अलावा क्या कांग्रेस को इस बात का डर है कि जो भी कुछ बचा खुचा अल्पसंख्यकों का वोट है वो ना छिटक जाए लिहाजा कांग्रेस के पास विरोध के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
क्या कहते हैं जानकार
जानकारों के मुताबिक अगर कांग्रेस की चुनावी जीत को देखें तो उसमें सवर्ण समाज, अल्पसंख्यक, दलित का बड़ा योगदान होता था। लेकिन जब देश में राम मंदिर आंदोलन अपने उत्कर्ष पर था वहीं से अल्पसंख्यक समाज का मोह भंग होने लगा खासतौर से उत्तर भारत के राज्यों में बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। 2004 से लेकर अगर 2019 के चुनावी समर की बात करें तो देश के सबसे बड़े सूबों में से एक और राजनीतिक रूप से सक्रिय दो राज्यों में उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस अपने गौरव को हासिल करने में कामयाब नहीं हुई। 2009 में यूपी में कांग्रेस का प्रदर्शन पिछले मुकाबलों से अच्छा रहा। लेकिन 2014 और 2019 में यूपी में नाकामी ही हाथ लगी। कांग्रेस के रणनीतिकारों का लगता है कि अगर समान नागरिक संहिता पर सरकार आगे बढ़ी तो उसके जरिए हिंदू समाज के वोटों का ध्रूवीकरण हो सकता है लिहाजा इस मुद्दे पर प्रखर विरोध के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता है।
