Suvendu Adhikari: "मैं टीएमसी में था, लोग पूछते हैं आपने क्यों छोड़ दिया टीएमसी? मैं तृणमूल में जब तक था, तब तक दीदी की पार्टी थी, लेकिन जब टीएमसी पीसीमनी (बुआ और पैसे) की पार्टी हो गई तो मैंने छोड़ दिया।" कुल्टी की रैली में सुवेंदु ने ये बात कही थी।
साल 2020, वो समय जब सुवेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी का नंबर टू कहा जाता था, लेकिन पार्टी में अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव ने उनको धीरे-धीरे हाशिए पर पहुंचा दिया। यह बात सुवेंदुको पता चली, और उसके बाद 2021 के चुनाव के ठीक पहले उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया। हालांकि, साल 2021 में बीजेपी 77 सीटों पर सिमट गई थी। इससे पहले साल 2016 चुनाव में बीजेपी महज 3सीटें ही जीत सकी थी।
हालांकि, साल 2021 विधानसभा चुनाव में एक बड़ा 'खेला' हो गया था। नंदीग्राम विधानसभा सीट पर सुवेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) ने ममता बनर्जी को 1956 वोटों से हरा दिया था। बीजेपी भले ही सत्ता से बाहर थी, लेकिन सुवेंदु की इस जीत से पार्टी का हौसला सातवें आसमान पर जा पहुंचा था।

जनता को संबोधित करते हुए सुवेंदु अधिकारी की फाइल फोटो। PTI
ममता सरकार के खिलाफ रचा 'चक्रव्यूह''
साल 2021 के बाद बीजेपी ने बंगाल में ममता सरकार के खिला'चक्रव्यूह' रचनेने की शुरुआत कदी। सुवेंदुदु ने विधानसभा में ममता सरकार को घेरने का जिम्मा उठाया। वो विधानसभा में विपक्ष के नेता चुने गए। सुवेंदु ने ममता के गढ़ में जाकर बीजेपी के कैडर को मजबूत करने की शुरुआत की। उनके लीडरशिप में बीजेपी ने बंगाल में ममतासरकार कीर नाकामियों को उजागर करना शुरू कर दिया। महिला सुरक्षा से लेकर वित्तीय और शिक्षक भर्ती घोटाले तक, बीजेपी ने हर मुद्दे को जोरशोर से उठाया।
बूथ-लेवल मशीनरी और माइक्रो-मैनेजमेंट
वहीं, विधानसभा चुनाव से पहले सुवेंदु ने केवल रैलियां नहीं कीं, बल्कि टीएमसी की तरह ही अपना मजबूत कैडर नेटवर्क तैयार किया।
टीएमसी के जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं को बीजेपी में शामिल कराकर उन्होंने बीजेपी के लिए एक ऐसा ढांचा तैयार किया जो बूथ स्तर पर टीएमसी का मुकाबला कर सके।

बंगाल में बूथ लेवल पर सुवेंदु अधिकारी ने बीजेपी को किया मजबूत। PTI
वोटों का ध्रुवीकरण करने में सफल रहे सुवेंदु
सुवेंदु ने चुनावी अभियान में खुद को "हिंदुत्व के रक्षक" के रूप में पेश किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें हिंदुओं, सिखों, जैनों और बौद्धों का समर्थन मिल रहा है, जिससे वोटों का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी की ओर शिफ्ट हुआ।
वामपंथी (CPM) वोटों का 'ट्रांसफर'
इस जीत का एक बड़ा राज सीपीएम (CPM) के वोटों का बीजेपी की ओर आना रहा। सुवेंदु अधिकारी ने खुद स्वीकार किया कि भवानीपुर जैसे इलाकों में सीपीएम के हजारों वोट बीजेपी के खाते में गए। उन्होंने "ममता हटाओ" के अभियान में उन वोटर्स को अपने पाले में कर लिया जो टीएमसी के विकल्प की तलाश में थे।
"भूमिपुत्र" बनाम "बाहरी" का नैरेटिखत्म किया
ममता बनर्जी अक्सर बीजेपी को "बाहरी" पार्टी कहती रही हैं, लेकिन सुवेंदु अधिकारी बंगाल की मिट्टी से जुड़े नेता हैं (नंदीग्राम और सिंगूर आंदोलनों के नायक)। उनके चेहरे ने बीजेपी के ऊपर से "बाहरी पार्टी" का टैग हटा दिया और बंगाल की जनता को एक स्थानीय चेहरा मिल गया।
सुवेंदु ने टीएमसी शासन के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। संदेशखाली जैसी घटनाओं और भर्ती घोटालों को उन्होंने जनता के बीच एक बड़ा मुद्दा बनाया, जिससे महिला वोटर्स और युवाओं का एक वर्ग टीएमसी से दूर हो गया।
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