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'धर्मनिरपेक्ष' और 'समाजवादी' शब्द संविधान की प्रस्तावना से हटेंगे या नहीं, 25 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा फैसला

सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्दों को शामिल करने को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर अपना निर्णय सुरक्षित रखा है। इन शब्दों को 1976 में 42वें संशोधन के दौरान विवादास्पद परिस्थितियों में जोड़ा गया था। अब सुप्रीम कोर्ट 25 नवंबर को इस पर अपना फैसला सुनाएगा।

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25 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा फैसला

Photo : ANI

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि वह भारतीय संविधान की प्रस्तावना से 'धर्मनिरपेक्ष' और 'समाजवादी' शब्दों को हटाने की मांग करने वाली याचिकाओं पर 25 नवंबर को आदेश पारित करेगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि भारतीय अर्थ में समाजवादी होने का मतलब केवल कल्याणकारी राज्य है। पीठ ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है और 42वें संशोधन की सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी जांच की है। शीर्ष अदालत भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी, वकील बलराम सिंह, करुणेश कुमार शुक्ला और अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इससे पहले भी पीठ ने कहा था कि धर्मनिरपेक्षता को हमेशा संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा माना जाता रहा है और मौखिक रूप से कहा था कि प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष' और 'समाजवादी' को पश्चिमी चश्मे से देखने की जरूरत नहीं है।

42वें संविधान संशोधन के माध्यम से प्रस्तावना में शामिल किए गए थे ये शब्द

पीठ ने कहा था कि समाजवाद का अर्थ यह भी हो सकता है कि अवसर की समानता हो और देश की संपत्ति का समान वितरण हो। आइए पश्चिमी अर्थ न लें। इसका कुछ अलग अर्थ भी हो सकता है। धर्मनिरपेक्षता शब्द के साथ भी यही बात है। याचिकाकर्ताओं में से एक भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा था कि 1976 में प्रस्तावना में शामिल किए गए दो शब्दों पर मूल प्रस्तावना की तारीख अंकित नहीं हो सकती, जिसे 1949 में तैयार किया गया था।

स्वामी ने अपनी याचिका में कहा था कि आपातकाल के दौरान 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से प्रस्तावना में शामिल किए गए दो शब्द 1973 में 13 न्यायाधीशों की पीठ द्वारा प्रसिद्ध केशवानंद भारती फैसले में बताए गए मूल ढांचे के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं, जिसके द्वारा संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति को संविधान की मूल विशेषताओं के साथ छेड़छाड़ करने से रोक दिया गया था। स्वामी ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने संविधान में इन दो शब्दों को शामिल करने को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया था और आरोप लगाया था कि ये दो शब्द नागरिकों पर तब भी थोपे गए जब संविधान निर्माताओं का लोकतांत्रिक शासन में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष अवधारणाओं को शामिल करने का कभी इरादा नहीं था। यह तर्क दिया गया कि इस तरह का समावेश अनुच्छेद 368 के तहत संसद की संशोधन शक्ति से परे था। आगे कहा गया कि डॉ. बीआर अंबेडकर ने इन शब्दों को शामिल करने को अस्वीकार कर दिया था, क्योंकि संविधान नागरिकों के चयन के अधिकार को छीनकर उन पर कुछ राजनीतिक विचारधाराएं नहीं थोप सकता।

Shashank Shekhar Mishra
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शशांक शेखर मिश्रा टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल (www.timesnowhindi.com) में बतौर कॉपी एडिटर काम कर रहे हैं। इन्हें पत्रकारिता में करीब 5 वर्षों का अनुभव है। इन पांच सालों में देश की राजनीति से लेकर देश-दुनिया में बनते-बिगड़ते सत्ता समीकरणों एवं घटनाओं को कवर करने का अनुभव है। राजनीति, रक्षा और आटोमोबाइल्स की खबरों में विशेष रूचि के साथ खोजी पत्रकारिता और स्टिंग ऑपरेशन का भी अनुभव है। टाइम्स नाउ नवभारत में देश-दुनिया की खबरों के साथ रियल टाइम डेस्क पर कार्य करने का अनुभव है। शशांक ने इन 5 वर्षों के पत्रकारिता के कैरियर के दौरान टेलीविजन और डिजिटल मीडिया में कार्य करने का अनुभव हासिल किया है। टाइम्स नाउ नवभारत में बतौर कॉपी एडिटर जुड़ने से पहले जागरण न्यू मीडिया, इनशार्ट्स, जी हिंदुस्तान और न्यूज हेल्पलाइन में सब एडिटर, रिपोर्टर और असिस्टेंट प्रोड्यूसर के तौर पर काम कर चुके हैं। पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। इसके बाद एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन से पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा इन मास कम्युनिकेशन एंड टीवी जर्नलिज्म किया हैं। शशांक को जिम जाना, एडवेंचर एक्टिविटी करना और नई तकनीक को जानना और समझना बेहद पसंद है। इसके अलावा शशांक को ड्राइव करना और अध्यात्म में भी काफी रुचि हैं। शशांक शेखर मिश्रा उत्तर प्रदेश की राजधानी और नवाबों के शहर के रूप में फेमस लखनऊ से ताल्लुक रखते हैं।

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