अफ्रीकी देश केन्या में इन दिनों विदेशी कारोबारियों और कंपनियों को भारी मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है। केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो ने 2 सितंबर को छोटे कारोबारियों और विदेशी हॉकरों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए थे। आज यानी 7 सितंबर से कार्रवाई शुरू हो गई है। वहीं, केन्या की ओर से दूसरी तरफ भारत के दिग्गज औद्योगिक समूह टाटा ग्रुप की कंपनी Tata Chemicals को देश छोड़ने के लिए कह दिया है। केन्या के इस सख्त रुख का असर वहां रहने वाले प्रवासी भारतीयों से लेकर भारत की छोटी से बड़ी कंपनियों के कारोबार पर पड़ सकता है। बता दें कि केन्या में करीब 200 भारतीय कंपनियां काम करती हैं।
इस सब के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर केन्या विदेशी कारोबारियों और कंपनियों पर इतनी सख्ती क्यों कर रहा है? क्या यह सिर्फ स्थानीय कारोबार और रोजगार को बढ़ावा देने की नीति है या कुछ और? आइए, Tata Chemicals विवाद के जरिए समझते हैं केन्या के इस बदले रुख की पूरी कहानी और इसका भारत से क्या कनेक्शन है।
केन्या आखिर चाहता क्या है?
मान लीजिए किसी विदेशी कंपनी को केन्या से कच्चा माल मिलता है। अगर वह कच्चा माल निकालकर सीधे विदेश भेज देती है, तो स्थानीय अर्थव्यवस्था को मुख्य रूप से खनन और शुरुआती स्तर के रोजगार का फायदा मिलेगा। लेकिन अगर उसी संसाधन से केन्या में फैक्ट्री लगती है, स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है, सप्लायर तैयार होते हैं और तैयार उत्पाद का निर्माण देश में होता है, तो आर्थिक लाभ कहीं ज्यादा बढ़ सकता है। रुटो सरकार इसी “local value addition” पर जोर दे रही है। यही सोच छोटे कारोबारियों पर लागू की जा रही है और बड़े विदेशी निवेशकों से भी ज्यादा स्थानीय आर्थिक योगदान की अपेक्षा की जा रही है।
टाटा केमिकल्स विवाद क्या है?
टाटा केमिकल्स का विवाद छोटे व्यवसायों के खिलाफ की जा रही सख्ती से अलग है। टाटा केमिकल्स मगाडी, काजियाडो काउंटी में लेक मगाडी पर सोडा ऐश का कारोबार करती है। 28 जुलाई को केन्या सरकार ने देश के माइनिंग कानूनों के तहत नियमों के पालन से जुड़ी कथित समस्याओं का हवाला देते हुए कंपनी के माइनिंग ऑपरेशन को रोक दिया। इस रोक का असर कंपनी के सोडा ऐश एक्सपोर्ट पर पड़ा है।
केन्या के राष्ट्रपति रुटो का मनना है कि कंपनी ने काजियाडो काउंटी में स्थानीय समुदाय को पर्याप्त लाभ नहीं पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि सरकार इस इलाके में ग्लास और केमिकल बनाने वाली सुविधाएं शुरू करने के लिए दो नई कंपनियां लाएगी। टाटा केमिकल्स ने कहा कि उसने केन्याई अधिकारियों द्वारा मांगी गई जानकारी जमा कर दी है और आगे की बातचीत का इंतजार कर रही है। कंपनी ने कहा है कि उसने सभी नियमों का पालन किया है और कानूनी व नियामक तरीकों से इस मामले को सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है।
भारतीय कंपनियां क्यों निशान पर?
केन्या सरकार के निशाने पर अबतक दो बड़ी भारतीय कंपनियां निशाने पर आई है। साल 2024 में, राष्ट्रपति रुटो ने अडानी ग्रुप के लगभग $2.5 बिलियन डॉलर के प्रस्ताव को रद्द कर दिया था। अब दूसरा मामला टाटा केमिकल्स है। इन दोनों कंपनियों को केन्या से बाहर निकालने का आदेश भारत के लिए राजनीतिक रूप से असहज करने वाला विषय बन गया है। दो साल के भीतर, भारत के दो सबसे जाने-माने कॉरपोरेट समूहों को उसी केन्याई राष्ट्रपति के कार्यकाल में बड़े झटकों का सामना करना पड़ा है, जिन्हें अन्यथा भारत का मित्र माना जाता है। उन्होंने दिसंबर 2023 में भारत की राजकीय यात्रा की थी। केन्या में अधिक भारतीय प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की मांग करते हुए, रुटो ने भारतीय कंपनियों को 'केन्या में निवेश करने के लिए अनुकूल और आकर्षक माहौल का लाभ उठाने' के लिए आमंत्रित किया था। तब से लेकर अब तक घटी घटनाएं स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े करती हैं।
भारत-केन्या संबंधों पर क्या असर होगा?
भारत, केन्या के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक भागीदार बना हुआ है और वहां भारतीय व्यापार की मजबूत मौजूदगी है। 2025-26 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग $4.31 बिलियन डॉलर था, और भारतीय कंपनियां केन्या में लगातार निवेश कर रही हैं। हालिया भागीदारी में प्रमुख बुनियादी ढांचे और बिजली क्षेत्र की परियोजनाएं शामिल हैं।
विदेशी निवेश के लिए इसका क्या मतलब?
विदेशी निवेश के लिए सबसे मज़बूत तर्क तब होता है जब वह पूंजी, तकनीक, कौशल, औद्योगिक क्षमता और निर्यात बाज़ारों तक पहुंच लाता है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि सरकार को स्पष्ट सीमा तय करने और अपने नियमों को अनुमानित तरीके से लागू करने की जरूरत है।
बड़ा सवाल- रुटो किसे फायदा पहुंचाना चाहते हैं?
अब तक यह पता नहीं चला है कि केन्या के राष्ट्रपति रुटो अपने देश में किन कंपनियों को लाना चाहते हैं। इसलिए, फिलहाल यह तर्क देना जल्दबाजी होगी कि रुटो जानबूझकर टाटा की जगह चीनी या पश्चिमी कंपनियों को ला रहे हैं। यह भी हो सकता है कि वे स्थानीय (केन्याई) हितधारक हों, जो मगाडी बेसिन में पाए जाने वाले अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की खोज करना चाहते हों।
केन्या में भारतीय कंपनियों पर संकट
भारत के लिए क्या है सीख?
भारत के लिए सीख यह है कि अफ्रीका में उसका निवेश एक नए राजनीतिक माहौल में प्रवेश कर रहा है। अफ्रीकी सरकारें अब तेजी से ऐसा निवेश चाहती हैं जो दृश्य रूप से स्थानीय औद्योगिक क्षमता, कौशल, तकनीक, आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) और रोजगार पैदा करे। टाटा ने पारंपरिक कॉरपोरेट मानकों के हिसाब से काफी योगदान दिया होगा, लेकिन रुटो बहुत बड़े पैमाने पर स्थानीय वैल्यू-एडिशन (मूल्य संवर्धन) की मांग कर रहे हैं।
केन्या का ‘लोकल फर्स्ट’ फॉर्मूला क्या सफल होगा?
जानकारों का कहना है कि केन्या ऐसे निवेशकों को लाना चाहता है जो ऐसी पूंजी लाएं जिससे नौकरियां पैदा हों और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिले, न कि ऐसे छोटे विदेशी व्यापारियों को जो केन्या के मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और सोशल सिक्योरिटी का फायदा तो उठाते हैं, लेकिन केन्याई छोटे व्यापारियों को नुकसान पहुंचाते हैं। बता दें कि केन्या का MSME सेक्टर बहुत बड़ा है और इसमें कई तरह के व्यवसाय शामिल हैं। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि केन्या के ‘लोकल फर्स्ट’ फॉर्मूला से देश की इकोनॉमी को फायदा पहुंचेगा।
