सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद में चार साल की बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या मामले पर आज सुनवाई की। कोर्ट ने यूपी पुलिस और निजी अस्पतालों के असंवेदनशील रवैये पर नाराजगी जताई। वहीं, मामले पर हैरानी जताते हुए पुलिस आयुक्त को तलब किया।
शीर्ष अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि एक तरफ जहां मासूम के साथ जघन्य अपराध हुआ, वहीं दूसरी तरफ रक्षक समझे जाने वाले विभागों ने अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में भारी लापरवाही बरती, जो 'संस्थागत क्रूरता' के समान है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 13 अप्रैल को जांच अधिकारी को भी तलब किया है।
अदालत ने क्या-क्या कहा?
अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि मामले की शुरुआती जांच में पुलिस ने न केवल देरी की, बल्कि साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के मानक प्रोटोकॉल का भी पालन नहीं किया। इसके साथ ही अस्पताल प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने कहा कि पीड़ित बच्ची को तत्काल और संवेदनशील उपचार देने के बजाय व्यवस्थागत औपचारिकताओं में उलझाए रखा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों के खिलाफ होने वाले ऐसे गंभीर अपराधों में राज्य की यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वह त्वरित न्याय सुनिश्चित करे, लेकिन इस मामले में हर स्तर पर संवेदनहीनता और विफलता ही हाथ लगी है।
इस मामले के मद्देनजर, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि वह जांच में हुई इन खामियों के लिए जवाबदेही तय करे और उन अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे जिन्होंने अपनी ड्यूटी में लापरवाही की है। अदालत का यह रुख साफ करता है कि भविष्य में ऐसे संवेदनशील मामलों में पुलिस और मेडिकल स्टाफ को न केवल कानूनी रूप से बल्कि मानवीय रूप से भी प्रशिक्षित होने की आवश्यकता है, ताकि पीड़ित को न्याय के लिए दर-दर न भटकना पड़े।
क्या है मामला?
नंदग्राम थाना क्षेत्र में 16 मार्च 2026 को घर के बाहर खेल रही चार वर्षीय बच्ची का अपहरण कर दुष्कर्म के बाद निर्ममता से हत्या कर दी गई थी। आरोपी को कुछ देर बाद ही पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। बच्ची के परिजन नंदग्राम पुलिस की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
