सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर को उस याचिका पर सुनवाई करेगी जिसमें मुद्दा उठाया गया है कि हीमोफीलिया से पीड़ित लोगों को संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा रहा है।जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने केंद्र सरकार से पूछा कि जब हीमोफीलिया को Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 के तहत विकलांगता के रूप में मान्यता दी गई है, तो इसे सरकारी नौकरियों में मिलने वाले चार फीसदी के आरक्षण के दायरे से बाहर क्यों रखा गया है?
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट जय़ना कोठारी और एडवोकेट रोहित शर्मा ने दलील दी कि हीमोफीलिया सीधे तौर पर लोकोमोटर डिसेबिलिटी या चलने-फिरने की अक्षमता की स्थिति पैदा करता है। इसके बावजूद इसे कानून की धारा 34 के तहत दिए जाने वाले आरक्षण से बाहर रखना भेदभाव है।
हीमोफीलिया-एक खतरनाक और आजीवन रहने वाली खून की बीमारी
हीमोफीलिया एक दुर्लभ और जीवनभर रहने वाली आनुवांशिक बीमारी है। इसमें मरीज के खून में क्लॉटिंग फैक्टर VIII या IX की कमी होती है, जिससे मामूली चोट भी गंभीर और जानलेवा साबित हो सकती है। बार-बार आंतरिक रक्तस्राव या खून बहने से खासकर जोड़ों में सूजन, दर्द और स्थायी विकलांगता का कारण बनता है। कई मामलों में यह खून का बहाव दिमाग, पेट या गले में हो जाए तो ये जानलेवा भी हो सकता है।
भारत में अनुमानित 1.36 लाख लोग हीमोफीलिया से पीड़ित हैं, लेकिन केवल करीब 21,000 ही पंजीकृत मरीज हैं। ज्यादातर मामलों का पता नहीं चल पाता क्योंकि अस्पतालों में रक्त जाँच की सुविधा सीमित है। इसका इलाज महँगा है क्योंकि मरीजों को बार-बार एंटी-हीमोफीलिया फैक्टर इंजेक्शन लेना पड़ता है, जो इंसानी खून से तैयार होता है। इससे HIV और हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों के संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है।
याचिकाकर्ता प्रेमा राम का संघर्ष
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले याचिकाकर्ता राजस्थान के जोधपुर जिले के रहने वाले प्रेमा राम हैं। उनकी उम्र 27 वर्ष है और मौजूदा समय में एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक हैं। प्रेमा राम को 50 फीसदी हीमोफीलिया (A) है और उनके पास बेंचमार्क डिसेबिलिटी का प्रमाणपत्र भी है।
उन्होंने 2025 में हुई यूपीएससी की परीक्षा के लिए फॉर्म भरा, लेकिन फॉर्म में हीमोफीलिया का विकल्प न होने के कारण उन्हें मजबूरी में नहीं चुनना पड़ा। UPSC और केंद्र सरकार को कई बार आवेदन भेजकर आरक्षण और अतिरिक्त सुविधाओं की मांग भी की, लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला। इसके बाद न्याय की उम्मीद में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है।
याचिकाकर्ता के तर्क और कोर्ट की प्रतिक्रिया
याचिकाकर्ता ने कोर्ट में कहा कि संविधान में उनको दिए गए कई मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया गया है। जिसमें समानता, समान अवसर, गरिमापूर्ण जीवन जीने का आधिकार शामिल है। उन्होंने ये भी दलील दी कि अन्य तरह की दिव्यांगता जैसे ऑटिज़्म या लोकोमोटर डिसेबिलिटी को 40 फीसदी से अधिक पर आरक्षण दिया जाता है, लेकिन हीमोफीलिया को बिना किसी ठोस और तार्किक आधार के बाहर रखा गया है।
जस्टिस अरविंद कुमार ने सुनवाई में कहा, हम यह नहीं जानना चाहते कि हीमोफीलिया के परिणाम क्या हैं। यहां अदालत के सामने बड़ा सवाल सिर्फ यह है कि सरकार ने इस बीमारी को विकलांगता के आधार पर मिलने वाले आरक्षण से बाहर क्यों रखा है? अगर सरकार के पास इसके लिए कोई सही वजह है तो ठीक नहीं तो इसे भेदभावपूर्ण ही माना जाएगा।
अगली सुनवाई होगी बेहद अहम
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को हीमोफीलिया को सूची से बाहर रखने का कारण स्पष्ट करने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि जब हीमोफीलिया को कानून की अनुसूची में शामिल किया गया है, तो बीमारी से पीड़ित लोगों को इसके लाभ से दूर रखना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। आने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या आरक्षण के दायरे में उन्हें भी शामिल किया जाएगा या नहीं।
