69 हजार शिक्षक भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट में फिर शुरू हुई सुनवाई और इसी के साथ करीब 69 हजार अभ्यर्थियों से जुड़े इस मामले में एक बार फिर नई उम्मीदें और आशंकाएं सामने आने लगी हैं। उत्तर प्रदेश के 69 हजार शिक्षक भर्ती मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपीलों पर नए सिरे से सुनवाई शुरू हुई। सुनवाई के दौरान अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की ओर से इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का विरोध किया गया। दलील दी गई कि अगर हाई कोर्ट का आदेश लागू किया गया, तो पहले से नौकरी कर रहे बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों की नौकरी पर संकट आ सकता है। इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की है। सरकार की ओर से बताया गया है कि करीब 9,500 अभ्यर्थियों को समायोजित करने की संभावना पर विचार किया गया है। सरकार ने इसकी सूची भी अदालत के सामने रखी है, जिसमें 4,945 ऐसे अभ्यर्थी शामिल हैं, जिनके पास बीएड की योग्यता है।
हाईकोर्ट के फैसले ने बढ़ाई टेंशन
दरअसल, इस पूरे विवाद की शुरुआत इलाहाबाद हाई कोर्ट के 13 अगस्त 2024 के फैसले से हुई थी। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 69 हजार शिक्षक भर्ती की चयन सूची को रद्द कर दिया था। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि आरक्षण के नियमों को ध्यान में रखते हुए तीन महीने के भीतर नए सिरे से चयन सूची तैयार की जाए।
अब हाई कोर्ट के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। मामले में कई अपीलें और याचिकाएं लंबित हैं। इनमें अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थी भी शामिल हैं, जिनकी ओर से यह आशंका जताई गई है कि अगर चयन सूची नए सिरे से बनाई जाती है, तो पहले से नियुक्त कई शिक्षकों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ सकती है।
राज्य सरकार से मांगे सुझाव
मंगलवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक अहम रास्ते पर राज्य सरकार से सुझाव मांगा। कोर्ट ने पूछा कि क्या ऐसे अभ्यर्थियों को हटाए बिना, अनारक्षित वर्ग के पात्र अभ्यर्थियों को भी समायोजित किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि अगर सभी पक्षों के हितों को संतुलित करने का कोई रास्ता निकलता है, तो संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करके अदालत उचित आदेश पारित कर सकती है। अदालत के सामने एक बड़ा सवाल यह है कि पहले से नौकरी कर रहे शिक्षकों का भविष्य सुरक्षित रखते हुए उन अभ्यर्थियों के साथ न्याय कैसे किया जाए, जो चयन प्रक्रिया और आरक्षण व्यवस्था को लेकर अपना पक्ष रख रहे हैं।
नए सिरे से होगी मामले की सुनवाई
हालांकि मामला सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है। सुनवाई के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS से जुड़े मुद्दे पर भी चर्चा हुई। ऐसे में आने वाले दिनों में अदालत के सामने आरक्षण, पात्रता, नियुक्ति और पहले से नौकरी कर रहे शिक्षकों के हित इन सभी पहलुओं पर विस्तार से दलीलें रखी जाएंगी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि मामले की नए सिरे से सुनवाई होगी और सभी पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया जाएगा। अदालत एक ऐसा रास्ता तलाशने की कोशिश कर रही है, जिसमें एक तरफ अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के दावों पर विचार हो और दूसरी तरफ उन शिक्षकों की नौकरी पर अचानक संकट न आए, जो पहले से सेवा में हैं।
क्या निकल पाएगा सामाधान
अब सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या सुप्रीम कोर्ट 69 हजार शिक्षक भर्ती विवाद में ऐसा समाधान निकाल पाएगा, जिससे किसी भी पक्ष के साथ बड़ा अन्याय न हो? और क्या 9,500 अभ्यर्थियों को समायोजित करने का राज्य सरकार का प्रस्ताव इस लंबे विवाद को खत्म करने की दिशा में कोई रास्ता खोल पाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाली सुनवाई में सामने आ सकते हैं।