AI की मदद से याचिकाएं तैयार करने के बढ़ते चलन पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई गहरी चिंता
- Edited by: रवि वैश्य
- Updated Feb 17, 2026, 11:27 PM IST
AI News: सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने वकीलों द्वारा 'एआई टूल' की मदद से तैयार की गई याचिकाएं दाखिल करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने जताई गहरी चिंता (फाइल फोटो)
भारत के नयी प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए दुनिया के सबसे बड़े कृत्रिम बुद्धिमत्ता सम्मेलन 'एआई इम्पैक्ट समिट 2026' की मेजबानी करने के बीच सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के 'एआई टूल' (AI Tool) से तैयार की गईं याचिकाएं दायर करने के बढ़ते चलन पर मंगलवार को गंभीर चिंता जताई।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने वकीलों द्वारा 'एआई टूल' की मदद से तैयार की गई याचिकाएं दाखिल करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई। पीठ ने कहा कि इनमें कई बार 'मर्सी बनाम मैनकाइंड' जैसे फैसलों का भी उल्लेख किया जा रहा है, जिसका अस्तित्व ही नहीं है।
'वकीलों ने याचिकाओं का मसौदा तैयार करने के लिए AI का इस्तेमाल शुरू कर दिया'
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, 'हम यह देखकर परेशान हैं कि कुछ वकीलों ने याचिकाओं का मसौदा तैयार करने के लिए एआई का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। यह बिल्कुल अनुचित है।' पीठ ने यह बात शिक्षाविद रूप रेखा वर्मा की एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कही, जिसमें राजनीतिक भाषणों को लेकर दिशानिर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया था। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि उन्हें हाल में 'मर्सी बनाम मैनकाइंड' नाम का एक ऐसा उद्धरण मिला, जो अस्तित्व में है ही नहीं।
'इससे उनकी विषयवस्तु का सत्यापन करना बहुत मुश्किल हो जाता है'
प्रधान न्यायाधीश ने ऐसे ही एक मामले का जिक्र किया और कहा कि न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अदालत में, 'एक नहीं, बल्कि ऐसे कई फैसलों का हवाला दिया गया था।' न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि कई बार, जिन फैसलों का जिक्र किया जाता है वे सही होते हैं, लेकिन उन फैसलों के साथ फर्जी उद्धरण जोड़ दिए जाते हैं और इससे उनकी विषयवस्तु का सत्यापन करना बहुत मुश्किल हो जाता है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, 'इससे न्यायाधीशों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।'इस बीच, न्यायमूर्ति बागची ने विधिक मसौदा तैयार करने की कला में गिरावट पर दुख जताया और कहा कि कई विशेष अनुमति याचिकाओं में ज्यादातर पिछले फैसलों के लंबे उद्धरण होते हैं, जिनमें कानूनी आधारों की मौलिक जानकारी बहुत कम होती है।
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