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बिहार की मतदाता सूची को लेकर मचे बवाल के बीच लालू यादव के सांसद पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, कर दी ये मांग

राजद सांसद सुधाकर सिंह ने 24 जून को जारी चुनाव आयोग के SIR में आदेश को असंवैधानिक बताया कहा। इसके पीछे तर्क देते हुए उन्होंने कहा है कि इस प्रक्रिया का कोई कानूनी आधार नहीं।

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राजद सांसद सुधाकर सिंह (फोटो-sudhakarsinghrjd)

बिहार में मतदाता सूची को लेकर चल रहे विशेष परीक्षण(SIR) को रोकने की मांग वाली एक और याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई है। बिहार की बक्सर लोकसभा क्षेत्र से सांसद सुधाकर सिंह ने ये याचिका लगाई है। इससे पहले दाखिल हुई राजद, कांग्रेस समेत तमाम दलों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 28 जुलाई को सुनवाई करेगा।

क्या नया है इस याचिका में?

सांसद सुधाकर सिंह ने 24 जून को जारी चुनाव आयोग के SIR में आदेश को असंवैधानिक बताया कहा। इसके पीछे तर्क देते हुए उन्होंने कहा है कि इस प्रक्रिया का कोई कानूनी आधार नहीं। यही नहीं इस प्रक्रिया से लाखों मतदाताओं के मतदान में अधिकार छीनने का खतरा मंडरा रहा है। हालांकि पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में आयोग ने कहा था कि ये प्रक्रिया वोटर्स को नाम काटने की नहीं बल्कि जोड़ने की प्रक्रिया है।

'2003 की मतदाता सूची को आधार मानना भेदभावपूर्ण'

राजद सांसद ने चुनाव आयोग पर पक्षपातपूर्ण तरीके से और जल्दबाजी में कार्रवाई का आरोप लगाया है। इस पिटिशन के जरिए उन्होंने देश मतदाता सूची परीक्षण के लिए देश भर में एक समान नियम बनाए जाने की मांग की है। बिहार के योग्य मतदाताओं को कोई नुकसान न हो इसके लिए सुधारकर सिंह ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन तुरन्त रोके जाने की मांग की है।

राजद सांसद में SIR के खिलाफ दिए गए हैं ये आधार!

  • एसआईआर प्रक्रिया मनमानी और असंवैधानिक है
केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा 24 जून को शुरू की गई विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया कानून और संविधान के विपरीत है जिससे लाखों मतदाता बाहर हो सकते हैं।
  • 6 महीने पहले बनी वोटर लिस्ट को नज़रअंदाज करना गलत
6 जनवरी को ही विशेष सारांश पुनरीक्षण (SSR) में बिहार की मतदाता सूची बनी थी, उसे 6 महीने में ही बदलना उचित नहीं है। इससे सभी लोगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
  • 2003 की लिस्ट को आधार बनाना अन्याय
राजद सिंह सुप्रीम कोर्ट के सामने कहा है कि साल 2003 की सूची में नाम न होने वालों को अलग से डॉक्यूमेंट देने की अनिवार्यता भेदभावपूर्ण है। वहीं उस सूची में शामिल लोगों को दस्तावेज़ जमा करने से छूट दी गई है।
  • सूची परीक्षण के दिया गया समय अपर्याप्त
पहले 35 दिन में करीब 8 करोड़ मौजूद मतदाताओं से इन्यूमेरेशन फार्म भरवाना और अगले एक महीने में सबकी जांच करवाना बिहार जैसे राज्य में संभव नहीं है।
  • सिर्फ बिहार में SIR पक्षपातपूर्ण
याचिका में कहा गया है कि मतदाता सूची को लेकर पूरे देश में एकसमान प्रक्रिया होनी चाहिए थी। सिर्फ बिहार में इंटेंसिव रिवीजन करना पक्षपात और राजनीति से प्रेरित लगता है। हालांकि आयोग साफ कर चुका है कि बिहार के बाद पूरे देश में मतदाता सूची का गहन परीक्षण होगा। यही नहीं मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए सारा कानून बोझ आम लोगों पर डाल दिया गया है।

याचिका में खड़े किए कई सवाल

इसके अलावा 4 लाख वॉलंटियर्स की दक्षता, ट्रेनिंग, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता, बाढ़ के समय इस प्रक्रिया को कराए जाने जैसे कई मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट से इस याचिका में सवाल खड़े किए गए हैं।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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