Rebel TMC MLA- पश्चिम बंगाल में सियासी नूराकुश्ती का दौर जारी है। इस कवायद में सबसे बड़ा नुकसान ममता बनर्जी का होने जा रहा है। तृमणूल कांग्रेस (TMC) के बागी विधायक विधानसभा पहुंचे हैं। टीएमसी के बागी विधायकों के समूह ने नए समूह के गठन को लेकर स्पीकर रथिंद्रनाथ बोस को पत्र सौंपा, जिसमें 58 विधायकों के हस्ताक्षर हैं। इनमें बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा शामिल हैं जिनका नाम प्रमुखता से सामने आया है। अधिकतर बागी विधायक काले शीशे वाली कारों में विधानसभा पहुंचे।
एक बागी विधायक मुस्तफिजुर रहमान ने कहा कि हमारे साथ कई विधायक हैं। मैंने समर्थन पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। इस सवाल पर कि कुल कितने विधायक हैं, उन्होंने कहा कि इन सबको अभी आने दीजिए। धीरे-धीरे पता चल जाएगा।
ममता को सबसे बड़ा झटका
दरअसल, ममता बनर्जी की पार्टी टूट के कगार पर है और उन्हें अपने सियासी जीवन का सबसे बड़ा झटका लगने जा रहा है। बता दें कि कल कोलकाता में ममता बनर्जी के धरने प्रदर्शन में महज 7 विधायक ही पहुंचे थे। टीएमसी ने चुनाव में कुल 80 सीटें जीती थीं, लेकिन अधिकतर विधायक पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं। संदीपन साह और ऋतुब्रत को पहले ही पार्टी से निलंबित किया जा चुका है। इससे पहले हुई एक अहम बैठक में 80 में से 20 विधायक ही पहुंचे थे।
ममता बनर्जी का धरना-प्रदर्शन
धरने प्रदर्शन में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने कहा कि पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कथित हमलों तथा रेहड़ी-पटरी वालों को हटाने संबंधी रेलवे के अभियान के खिलाफ प्रस्तावित धरने को पुलिस की अनुमति नहीं मिलने के बावजूद उनकी पार्टी इस पर आगे बढ़ेगी। उन्होंने आरोप लगाया कि आम लोग और छोटे व्यापारी भय में जी रहे हैं, जबकि रेहड़ी-पटरी वालों को उपयुक्त पुनर्वास योजना के बिना हटाया जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि सत्तारूढ़ भाजपा उनकी पार्टी (तृणमूल कांग्रेस) के विधायकों को अपने पाले में करने के लिए धन-बल का इस्तेमाल कर रही है।
ममता बनर्जी का सरकार पर हमला
ममता बनर्जी ने कहा, लोग भयभीत क्यों हैं? लोग चिंतित क्यों हैं? पूरा माहौल बदल गया है। कोलकाता और बंगाल को अशिक्षित लोगों को सौंप दिया गया है। बनर्जी ने दावा किया कि विधानसभा चुनाव के बाद से तृणमूल के 12 कार्यकर्ता मारे गए हैं और हजारों पार्टी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है, जबकि कई अन्य को अपना घर-बार छोड़ने के लिए मजबूर किया गया है। उन्होंने कहा, लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन में व्यवधान डाला जा रहा है।
ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर का सबसे कठिन दौर
यह ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर के सबसे कठिन दौर में से एक है। जब उन्होंने 1998 में टीएमसी की शुरुआत की थी, तब वह अपने 40 के दशक के शुरुआती सालों में थीं। अब, 71 वर्ष की उम्र में उनके सामने उस पार्टी को बचाने और उस पर नियंत्रण बनाए रखने की चुनौती है जिसे उन्होंने तीन दशक पहले बनाया था। इन 30 वर्षों में से 15 वर्ष तृणमूल सत्ता में रही है, जिससे उनका काम आसान रहा था। याद रखने लायक बात है कि पिछले 50 वर्षों में पश्चिम बंगाल में सत्ता से बेदखल होने वाली कोई भी पार्टी दोबारा राज्य की सत्ता में नहीं लौटी है। केवल कांग्रेस ने ही यह दुर्लभ उपलब्धि हासिल की थी, लेकिन वह भी 1977 में वाम मोर्चा (Left Front) द्वारा बेदखल किए जाने से पहले की बात है।
क्या ममता से छिनेगी पार्टी और सिंबल?
कयास लगने लगे हैं कि क्या बंगाल में महाराष्ट्र मॉडल रिपीट हो सकता है। महाराष्ट्र में शिवसेना विधायकों ने अलग गुट बना लिया था और उद्धव ठाकरे से असली शिवसेना ही छिन गई थी। फिलहाल बंगाल में टीएमसी के 50 से अधिक बागी विधायक बताए जा रहे हैं। 54 विधायक अलग होते हैं तो इन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा। इस गुट को ही पार्टी का सिंबल भी मिल जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो ममता के हाथों से न सिर्फ पार्टी छिनेगी बल्कि चुनाव चिह्न भी चला जाएगा। बागी विधायकों ने कहा है कि पार्टी में बड़े पैमाने पर असंतोष है। बागी विधायक स्पीकर को आज ही पत्र सौंप सकते हैं। महाराष्ट्र में भी शिवसेना के साथ कुछ ऐसा ही हुआ था। बागी नेता रिजू दत्ता ने कहा है कि हमारे साथ 55 विधायक हैं और हम पार्टी सिंबल पर भी दावा करेंगे। विपक्ष का नेता हमारी पसंद का होगा। उन्होंने कहा कि पार्टी में सीनियर नेताओं का अपमान हो रहा था। नेताओं में आई-पैक को लेकर गुस्सा था।
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