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क्या ममता से छिनेगी TMC और सिंबल? पार्टी बचेगी या वजूद होगा खत्म, क्या महाराष्ट्र मॉडल होगा रिपीट?

क्या ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी इन पांच सालों में खुद को बचाए रख पाएगी ताकि 2029 के लोकसभा और 2031 के विधानसभा चुनावों में भाजपा का मुकाबला कर सके?

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TMC पर छाए संकट के बादल
Authored by: Amit Mandal
Updated Jun 2, 2026, 13:40 IST

Will Mamata Save TMC: विधानसभा चुनाव में हार ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के वजूद पर खतरा पैदा कर दिया है। क्या 'जोड़ा घास फूल' (TMC का चुनाव चिह्न) उस संकट से उबर पाएगा, जो इस समय तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा अस्तित्व का संकट नजर आ रहा है? यह सवाल पूरे पश्चिम बंगाल में पूछा जा रहा है। क्या ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी इन पांच सालों में खुद को बचाए रख पाएगी ताकि 2029 के लोकसभा और 2031 के विधानसभा चुनावों में भाजपा का मुकाबला कर सके? भाजपा इस पूर्वी राज्य में एक विशाल ताकत बनकर उभरी है, और यहां से वह और मजबूत ही होगी। दूसरी ओर, टीएमसी के अंदर निराशा और विद्रोह नजर आ रहा है।

विधायक संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी हुए बागी

रिपोर्टों के अनुसार, टीएमसी के बागी नेताओं ने एक बैठक की थी, जिसमें उन्होंने ममता बनर्जी और उनके भतीजे व राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की पार्टी लाइन का विरोध किया। सोमवार को टीएमसी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए दो विधायकों संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी को निलंबित कर दिया। वरिष्ठ नेता और विधायक कुणाल घोष ने हाथ जोड़कर उन विधायकों से अपील की, जिन्हें पार्टी नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह करने के लिए गुमराह किया जा रहा था। खुद ममता बनर्जी सोमवार को फेसबुक लाइव पर आईं और स्वीकार किया कि टीएमसी के भीतर फूट डालने की साजिश रची जा रही है।

ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर का सबसे कठिन दौर

यह ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर के सबसे कठिन दौर में से एक है। जब उन्होंने 1998 में टीएमसी की शुरुआत की थी, तब वह अपने 40 के दशक के शुरुआती सालों में थीं। अब, 71 वर्ष की उम्र में उनके सामने उस पार्टी को बचाने और उस पर नियंत्रण बनाए रखने की चुनौती है जिसे उन्होंने तीन दशक पहले बनाया था। इन 30 वर्षों में से 15 वर्ष तृणमूल सत्ता में रही है, जिससे उनका काम आसान रहा था। याद रखने लायक बात है कि पिछले 50 वर्षों में पश्चिम बंगाल में सत्ता से बेदखल होने वाली कोई भी पार्टी दोबारा राज्य की सत्ता में नहीं लौटी है। केवल कांग्रेस ने ही यह दुर्लभ उपलब्धि हासिल की थी, लेकिन वह भी 1977 में वाम मोर्चा (Left Front) द्वारा बेदखल किए जाने से पहले की बात है।

विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता का अभाव

इन हालात में पार्टी के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता का सवाल उठता है। अभिनय और खेल जगत की मशहूर हस्तियां टीएमसी नेतृत्व का एक बड़ा हिस्सा हैं। उन्हें टिकट इसलिए दिए गए थे क्योंकि वे मतदाताओं को आकर्षित करते थे, और अनुकूल जमीनी स्थिति के कारण वे सीटें जीत गए। इसकी संभावना बहुत कम है कि उनमें से अधिकांश टीएमसी के साथ टिके रहेंगे, और हम पहले से ही ऐसा होते देख रहे हैं। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि खुद टीएमसी में एक ठोस विचारधारा की कमी है। यह कमी इसके नेताओं को 'जड़विहीन' बना देती है, जिससे वे किसी भी अचानक आई बाढ़ में आसानी से बह जाते हैं।

4 मई को बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद से ही टीएमसी में हड़कंप मचा हुआ है। भाजपा के पास अब 294 में से 208 सीटें हैं, जबकि टीएमसी के पास केवल 80 सीटें बची हैं। इनमें से दो विधायकों को निलंबित कर दिया गया है। ऐसे में विधायकों पर ममता बनर्जी की पकड़ पर सवाल खड़े हो गए हैं।

TMC अचानक इतनी कमजोर क्यों दिखने लगी?

टीएमसी के सामने खड़ा यह संकट रविवार को पूरी तरह उजागर हो गया। पीटीआई (PTI) ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी कि 80 टीएमसी विधायकों में से लगभग 60 विधायक उस बैठक में शामिल नहीं हुए जिसकी अध्यक्षता ममता बनर्जी करने वाली थीं। हालांकि, टीएमसी प्रवक्ता कुणाल घोष ने विधायकों की गैरमौजूदगी का बचाव करते हुए कहा कि वे अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के बाद विरोध कार्यक्रमों में व्यस्त थे। लेकिन बैठक फिर भी हुई क्योंकि 20 विधायक कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे, जिनके साथ ममता ने एक अनौपचारिक चर्चा की। राजनीतिक गलियारों में इस बात की जोरदार चर्चा है कि ममता अपने कुनबे को एक साथ रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। टीएमसी शासन के दौरान भ्रष्टाचार, उत्पीड़न और कानून-व्यवस्था की स्थिति पर जनता का गुस्सा इसके कुछ मुख्य कारण हो सकते हैं।

TMC में टूट का खतरा

TMC में टूट का खतरा

क्या ममता से छिनेगी पार्टी और सिंबल?

कयास लगने लगे हैं कि क्या बंगाल में महाराष्ट्र मॉडल रिपीट हो सकता है। महाराष्ट्र में शिवसेना विधायकों ने अलग गुट बना लिया था और उद्धव ठाकरे से असली शिवसेना ही छिन गई थी। फिलहाल बंगाल में टीएमसी के 50 से अधिक बागी विधायक बताए जा रहे हैं। 54 विधायक अलग होते हैं तो इन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा। इस गुट को ही पार्टी का सिंबल भी मिल जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो ममता के हाथों से न सिर्फ पार्टी छिनेगी बल्कि चुनाव चिह्न भी चला जाएगा। बागी विधायकों ने कहा है कि पार्टी में बड़े पैमाने पर असंतोष है। बागी विधायक स्पीकर को आज ही पत्र सौंप सकते हैं। महाराष्ट्र में भी शिवसेना के साथ कुछ ऐसा ही हुआ था। बागी नेता रिजू दत्ता ने कहा है कि हमारे साथ 55 विधायक हैं और हम पार्टी सिंबल पर भी दावा करेंगे। विपक्ष का नेता हमारी पसंद का होगा। उन्होंने कहा कि पार्टी में सीनियर नेताओं का अपमान हो रहा था। नेताओं में आई-पैक को लेकर गुस्सा था।

महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ क्या हुआ था?

2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना ने भाजपा से अलग होकर कांग्रेस और एनसीपी (NCP) के साथ मिलकर 'महा विकास अघाड़ी' (MVA) सरकार बनाई थी, जिसमें उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने थे।

शिंदे गुट का विद्रोह: जून 2022 में एकनाथ शिंदे शिवसेना के कई विधायकों के साथ सूरत और फिर गुवाहाटी चले गए। उनका आरोप था कि उद्धव ठाकरे कांग्रेस और एनसीपी के साथ जाकर पार्टी की हिंदुत्व विचारधारा से समझौता कर रहे हैं। भारी राजनीतिक संकट के चलते उद्धव ठाकरे ने जून 2022 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

शिंदे की ताजपोशी: इसके बाद एकनाथ शिंदे ने भाजपा (BJP) के समर्थन से सरकार बनाई और वे खुद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने।

पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह का विवाद: चुनाव आयोग ने फरवरी 2023 में एकनाथ शिंदे के धड़े को असली शिवसेना के रूप में मान्यता दी और 'तीर-कमान' चुनाव चिन्ह भी उन्हें आवंटित कर दिया।

क्या टीएमसी नेता बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं?

पार्षदों से लेकर विधायकों और यहां तक कि एक सांसद सहित टीएमसी नेताओं की भारी भीड़ ने ऐसे संकेत दिए हैं कि वे पाला बदलने के लिए तैयार हैं। बारासात से टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने पिछले हफ्ते पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। काकोली दस्तिदार, जिन्होंने 1998 में टीएमसी की स्थापना के समय ममता बनर्जी का साथ दिया था, उन्होंने बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के साथ एक प्रशासनिक बैठक में भाग लिया। नादिया, उत्तर 24 परगना और हुगली के तीन जिलों के छह टीएमसी विधायक भी इस बैठक का हिस्सा थे।

लोकसभा में टीएमसी के 29 सांसद थे, लेकिन बशीरहाट के सांसद हाजी नूरुल इस्लाम के निधन के बाद यह संख्या घटकर 28 रह गई है। राजनीतिक विशेषज्ञ उनके बीच पनप रहे असंतोष की बात कर रहे हैं। इसके पीछे एक कारण यह हो सकता है कि इन सांसदों को 2029 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिख रहा है।

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