देश

सुप्रीम कोर्ट में UGC के नए नियमों को चुनौती, CJI बोले-याचिका को सुनवाई के लिए करेंगे लिस्ट

इन नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि यूजीसी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे प्रावधान बनाए हैं जो संविधान के मूल ढांचे, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ हैं।

_UGS row

यूजीसी नियमों का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

Photo : PTI

UGS Rules Row: UGC के नए नियम को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट से जल्द सुनवाई की मांग की गई है। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई का भरोसा दिया है। चीफ जस्टिस (CJI) ने कहा कि हमें मामले के बारे में जानकारी है। आप अपनी याचिकाओं में कोई त्रुटि हो तो उसे ठीक करें। हम सुनवाई के लिए लिस्ट करेंगे। बता दें कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा हाल ही में अधिसूचित किए गए प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन) रेगुलेशन 2026 को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। यूजीसी के मुताबिक, नए नियमों से एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के खिलाफ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकने में मदद मिलेगी। इन नियमों का पालन न करने पर UGC मान्यता रद्द करने तक का प्रावधान है।

सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के हाल में अधिसूचित एक नियम को चुनौती देने वाली उस याचिका पर सुनवाई के लिए बुधवार को सहमति जताई, जिसमें यह दलील दी गई है कि नियम में जाति-आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई गई है और कुछ श्रेणियों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा गया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका पर तत्काल सुनवाई की मांग करने वाले वकील की दलीलों पर गौर किया।

वकील ने कहा, सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव बढ़ सकता है। मेरा मुकदमा ‘राहुल दीवान एवं अन्य बनाम भारत सरकार’ है। इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा, हमें पता है कि क्या हो रहा है। सुनिश्चित करें कि खामियां दूर कर दी जाएं। हम इसे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेंगे। भेदभाव की शिकायतों की जांच और समता को बढ़ावा देने के लिए सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में समता समिति गठित करने को अनिवार्य करने वाले नए नियम 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए थे।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 के तहत इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), दिव्यांगजन और महिलाओं के प्रतिनिधियों को शामिल करना अनिवार्य किया गया है। याचिका में कहा गया है कि नए नियमों में जाति-आधारित भेदभाव को केवल एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव तक सीमित कर दिया गया है। इन नियमों के खिलाफ विभिन्न स्थानों पर विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं, जहां छात्र समूह और संगठन इन्हें तत्काल वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर

इन नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि यूजीसी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे प्रावधान बनाए हैं जो संविधान के मूल ढांचे, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ हैं। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इन नियमों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है और इनके क्रियान्वयन पर रोक लगाने का आग्रह किया गया है।

याचिका बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र मृतुंजय तिवारी की ओर से दायर की गई है और उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट में नीरज सिंह पैरवी कर रहे हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि समानता और सामाजिक न्याय का उद्देश्य महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे लागू करने के लिए ऐसे नियम नहीं बनाए जा सकते जो संविधान द्वारा संरक्षित अधिकारों को सीमित करें या विश्वविद्यालयों के अकादमिक वातावरण को भय और असुरक्षा से भर दें।

जातिगत भेदभाव सिर्फ आरक्षित वर्ग तक सीमित नहीं

याचिका में सबसे अहम तर्क यह उठाया गया है कि जातिगत भेदभाव केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसी भी जाति के व्यक्ति के खिलाफ हो सकता है, चाहे वह तथाकथित उच्च जाति से ही क्यों न हो। याचिकाकर्ता का कहना है कि संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है और कानून का उद्देश्य किसी विशेष वर्ग को विशेष संरक्षण देना नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को अपमान, उत्पीड़न और भेदभाव से बचाना होना चाहिए। यदि नियम केवल कुछ समुदायों के अनुभवों को मान्यता देंगे और अन्य समुदायों के खिलाफ होने वाले सामाजिक अपमान या उत्पीड़न को नजरअंदाज करेंगे, तो यह स्वयं समानता के सिद्धांत का उल्लंघन होगा।

याचिका में क्या-क्या कहा गया?

याचिका में विस्तार से कहा गया है कि हाल के वर्षों में शैक्षणिक परिसरों, सोशल मीडिया मंचों और सार्वजनिक विमर्श में सामान्य वर्ग या तथाकथित ऊँची जाति से जुड़े छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ सामूहिक और अपमानजनक टिप्पणियाँ सामने आई हैं। उदाहरण के तौर पर, याचिका में उल्लेख है कि कई बार सार्वजनिक मंचों और चर्चाओं में यह कहा जाता है कि जनरल कैटेगरी के लोग जन्म से ही शोषक होते हैं, ऊँची जाति वालों का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, इनकी उपलब्धियां केवल विशेषाधिकार का परिणाम हैं, मेहनत का नहीं, या इनकी सामाजिक पहचान अपने आप में अपराध है। याचिका के अनुसार, इस तरह की टिप्पणियाँ भी किसी व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं और उसे उसकी पहचान के आधार पर कलंकित करती हैं, जो किसी भी दृष्टि से भेदभाव से कम नहीं है।

देश और दुनिया की ताजा ख़बरें (News in Hindi) पढ़ें हिंदी में और देखें छोटी बड़ी सभी न्यूज़ Times Now Navbharat Live TV पर। देश (India News) अपडेट और चुनाव (Elections) की ताजा समाचार के लिए जुड़े रहे Times Now Navbharat से ।

गौरव श्रीवास्तव
गौरव श्रीवास्तव author

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुना... और देखें

End of Article