कांग्रेस ने शुक्रवार को विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (SIR) के मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर तीखा निशाना साधा। पार्टी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने वर्ष 2024 के बाद से मतदाता सूचियों के एसएसआर (SSR) को रोककर नई पीढ़ी के मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल होने की प्रक्रिया को बुरी तरह प्रभावित किया है।
राजीव गांधी और पीएम मोदी की तुलना
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट के जरिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तुलना की। उन्होंने लिखा, "एक प्रधानमंत्री ने जेन-जी को वोट का अधिकार दिया, दूसरे ने उसे छीनने की कोशिश की।"
राजीव गांधी का कांग्रेस ने दिया उदाहरण
जयराम रमेश ने बताया कि एक प्रधानमंत्री (राजीव गांधी) ने दिसंबर 1988 में संसद के शीतकालीन सत्र में संविधान के अनुच्छेद 326 में संशोधन करके मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी थी। संविधान (61वां संशोधन) अधिनियम, 1988 के तहत अनुच्छेद 326 में यह बदलाव किया गया था, जिसने युवाओं को सशक्त बनाने का काम किया।
'युवाओं की उम्मीदों को किया निराश'
दूसरी ओर, केंद्र की वर्तमान सरकार पर आरोप लगाते हुए रमेश ने कहा कि "एक अन्य प्रधानमंत्री" ने यह सुनिश्चित किया है कि 2024 के बाद से मतदाता सूचियों का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण न हो, ताकि जेन-जी मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में दर्ज ही न हो सके। उन्होंने सरकार के इस कदम को युवाओं की आकांक्षाओं और उम्मीदों को निराश करने वाला बताया।
गोवा में गड़बड़ियों का दावा
इससे एक दिन पहले पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने अंग्रेजी दैनिक ’द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित खबर का हवाला देते हुए कहा कि ज्ञानेश कुमार ने आयोग की विश्वसनीयता को नष्ट कर दिया है। इस खबर में कहा गया है कि गोवा में 97 मतदाताओं के मामलों में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) ने दस्तावेजों की जांच करने और सुनवाई के बाद उन्हें अंतिम मतदाता सूची में शामिल करने योग्य पाया था, लेकिन ’’ईसीआईनेट’’ सॉफ्टवेयर में उन्हें दोबारा शामिल करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। गोवा के सीईओ कार्यालय ने इस संबंध में सात दिनों में आठ बार अनुरोध किया था। रमेश ने इस खबर का उल्लेख करते हुए ’एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा ’’प्रत्येक नए साक्ष्य’’ से इस बात की पुष्टि होती है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पिछले करीब दो वर्षों से चुनाव प्रक्रिया को लेकर जो सवाल उठाते रहे हैं, वे गंभीर हैं।
