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अखिलेश के '2024' प्लान को मायावती ने किया डिकोड, PDA को बताया परिवार दल अलायंस

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Jun 19, 2023, 01:50 PM IST

Lok Sabha Elections: बसपा सुप्रीमो ने एक ट्वीट में कहा है कि सपा द्वारा एनडीए के जवाब में पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) का राग, इन वर्गों के अति कठिन समय में भी केवल तुकबन्दी के सिवाय और कुछ नहीं। इनके पीडीए का वास्तव में अर्थ परिवार, दल, एलाइन्स है जिस स्वार्थ में यह पार्टी सीमित है।

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बसपा सुप्रीमो मायावती

Photo : BCCL

Lok Sabha Elections: 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भले ही अभी वक्त हो, लेकिन सियासत के शतरंज में बिसातें बिछना अभी से शुरू हो गई हैं। एक तरफ भाजपा है तो दूसरी तरफ विपक्षी दल। इन विपक्षी पार्टियों का एक ही उद्देश्य है कि किसी भी तरीके से नरेंद्र मोदी को फिर से सत्ता हासिल करने से रोका जाए।

इसी क्रम में समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने नई रणनीति तैयार की है। उन्होंने भाजपा को रोकने के लिए जातीय समीकरण तैयार किया है। उन्होंने इसको PDA नाम दिया है। उन्होंने कहा है कि वह पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक के गठजोड़ से भाजपा को हराएंगे।

मायावती ने बोला हमला

अब बसपा सुप्रीमो मायावती ने अखिलेश यादव पर हमला बोला है। उन्होंने सोमवार को एक ट्वीट में कहा है कि सपा द्वारा एनडीए के जवाब में पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) का राग, इन वर्गों के अति कठिन समय में भी केवल तुकबन्दी के सिवाय और कुछ नहीं। इनके पीडीए का वास्तव में अर्थ परिवार, दल, एलाइन्स है जिस स्वार्थ में यह पार्टी सीमित है। इसीलिए इन वर्गों के लोगों को जरूर सावधान रहने की जरूरत है।

मायावती क्यों हैं नाराज

दरअसल, दलित और पिछड़ा वर्ग मायावती का कोर वोटर है। अखिलेश यादव इसी वोटबैंक को आगामी लोकसभा चुनाव में बसपा से छीनना चाहते हैं। समाजवादी पार्टी का मानना है कि अल्पसंख्यक वोट उसके साथ है। अगर दलित वोट भी उसके पक्ष में आया गया तो वह भाजपा को हरा सकती है, लेकिन मायावती किसी भी हाल में दलित वोटबैंक को खोना नहीं चाहती हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी जब अखिलेश यादव ने मायावती के साथ चुनाव लड़ा था, तब भी सीधा फायदा बसपा को ही हुआ था। इस चुनाव में बसपा की सीटों में इजाफा हुआ था। जबकि, मायावती अपना वोटबैंक सपा के खातें में ट्रांसफर नहीं करवा सकी थींं।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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