Who Was Mahendranath Mulla: कैप्टनमहेंद्रनाथ मुल्ला का नाम कौन नहीं जानता। भारतीय नौसेना के इस जांबाज अफसर ने 1971 भारत-पाक युद्ध के दौरान अदम्य साहस की मिसाल कायम करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी। आज ही के दिन उनका जन्म हुआ था। 15 मई, 1926 को उत्तर प्रदेश गोरखपुर में जन्मे महेंद्रनाथ अपनी बहादुरी के लिए आज भी याद किए जाते हैं। 1971 युद्ध के दौरान वह भारतीय समुद्रवाहक पोत 'आईएनएस खुखरी' (INS Khukri) के कप्तान थे। भारत-पाक युद्ध के दौरान जब खुखरी को निशाना बनाया गया तो उन्होंने सैनिकों को बचाने के लिए जहाज छोड़ने से इनकार कर दिया। इसी जहाज पर बेखौफ होकर उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया था।
पाकिस्तान पोत ने बनाया निशाना
भारत-पाकिस्तान 1971 युद्ध में एक मौका ऐसा भी आया जब पाकिस्तानी नौसेना ने भारतीय नौसेना को टक्कर दी। अरब सागर में पाकिस्तान की एक पनडुब्बी भारतीय जलसीमा में घूम रही थी। इसे खोजने और बर्बाद करने के लिए 'आईएनएस खुखरी' और 'कृपाण' पोतों को लगाया गया। लेकिन पाकिस्तानी पनडुब्बी 'हंगोर' ने खुखरी को निशाना बना लिया। कप्तान महेंद्रनाथ मुल्ला ने डूबते हुए खुखरी को छोड़ने से इनकार कर दिया और अंत तक सैनिकों को बचाते रहे। आईएनएस खुखरी के साथ ही महेन्द्रनाथ मुल्ला ने भी जल समाधि ले ली। उन्हें मरणोपरांत 'महावीर चक्र' से सम्मानित किया गया।
सतह पर आई पाकिस्तान पनडुब्बी हंगोर
भारतीय नौसेना को अंदाजा था कि युद्ध शुरू होने पर पाकिस्तानी पनडुब्बियां मुंबई के बंदरगाह को अपना निशाना बना सकती है। इसलिए फैसला लिया गया कि लड़ाई शुरू होने से पहले सारे नौसेना फ्लीट को मुंबई से बाहर ले जाया जाए। जब युद्ध छिड़ा तो पाकिस्तानी पनडुब्बी दमन-दीव इलाके में घूमती रही। इस बीच उसमें कुछ दिक्कत आ गई और उसे ठीक करने के लिए उसे समुद्र की सतह पर आना पड़ा। 36 घंटे के बाद पनडुब्बी ठीक कर ली गई, लेकिन उसकी ओर से भेजे संदेशों से भारतीय नौसेना ने अंदाजा लगा लिया कि एक पाकिस्तानी पनडुब्बी दीव के तट के आसपास घूम रही है।
भारतीय नौसेना मुख्यालय ने आदेश दिया कि इस पनडुब्बी को तुरंत नष्ट किया जाए और इसके लिए एंटी सबमरीन फ्रिगेट 'आईएनएस खुखरी' और 'कृपाण' समुद्री पोतों को तैनात किया गया। दोनों पोत अपने मिशन पर 8 दिसंबर को मुंबई से रवाना हो गए।
पाकिस्तान को खुखरी और कृपाण का लगा पता
लेकिन लंबी दूरी से टोह लेने की क्षमता के कारण पाकिस्तानी पनडुब्बी 'हंगोर' को पहले ही खुखरी और कृपाण के आने का पता चल गया। दोनों भारतीय पोत पाकिस्तानी पनडुब्बी की खोज कर रहे थे। हंगोर ने इनके नजदीक आने का इंतजार किया। पहला टॉरपीडो कृपाण पर चलाया, लेकिन टॉरपीडो बिना फटे उसके नीचे से गुजर गया। यह भारतीय पोतों को अब हंगोर का पता लग चुका था। इसके बाद हंगोर ने खुखरी को निशाना बनाते हुए उस पर गोला दागा। इस बार निशान सही लगा और आईएनएस खुखरी में दो बड़े छेद हो गए। कुछ मिनटों बाद जहाज का डूबना शुरू हो गया।
कैप्टन महेंद्रनाथ हुए घायल
पोत को निशाना बनाते ही हलचल मच ई। पहला टॉरपीडो टकराते ही जहाज के कप्तान महेंद्रनाथ मुल्ला का सिर लोहे से टकराया। उनके सिर से खून बहने लगा। दूसरा धमाका होते ही पूरे पोत की बिजली चली गई। महेन्द्रनाथ मुल्ला ने अपने सहकर्मी मनु शर्मा को मामले का पता लगाने का आदेश दिया। मनु ने देखा कि खुखरी में दो छेद हो चुके हैं और जहाज में तेजी से पानी भर रहा है।पोत छोड़ने से किया इनकार
मनु शर्मा और लेफ्टिनेंट कुंदनमल आईएनएस खुखरी के ब्रिज पर महेंद्रनाथ के साथ थे। महेंद्रनाथ ने उन्हें ब्रिज से नीचे जाने को कहा। दोनों ने मुल्ला को भी साथ लाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने जहाज छोड़ने से इनकार कर दिया। उन्होंने दूसरे सैनिकों को भी जहाज से चले जाने को कहा। जब मनु शर्मा ने समुद्र में छलांग लगाई तो पूरे पानी में आग लगी हुई थी। उन्हें आग के नीचे से तैरना पड़ा। इस दौरान पूरे पोत मे आग लग गई थी। लेकिन महेंद्रनाथ मुल्ला अपनी सीट पर बैठे रेलिंग पकड़े हुए थे और उनके हाथ में अब भी जलती हुई सिगरेट थी। ये दिन था 9 दिसम्बर, 1971 और इसी दिन उन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
शहादत का हुआ सम्मान
कप्तान महेंद्रनाथ मुल्ला ने भारतीय नौसेना की सर्वोच्च परंपरा का निर्वाह करते हुए अपना जहाज नहीं छोड़ा और जल समाधि ले ली। उनकी इस वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत 'महावीर चक्र' से सम्मानित किया गया। आज भी नौसेना में कप्तान महेंद्रनाथ मुल्ला की बहादुरी के किस्से सुनाए जाते हैं कि किस तरह उन्होंने कैप्टन के जहाज नहीं छोड़ने की परंपरा को निभाया। इस जांबाज ने साबित कर दिया कि भारतीय सेना क्यों दुनिया में अपनी वीरता के लिए मशहूर है।
